एक ऐसा मंदिर जहां होती है योनी की पूजा, पीरियड के दौरान बंद रहता है मंदिर !

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भारत में मूर्ति पूजा, पेड़ पूजा, इंसान, जीव-जंतु समेत शिवलिंग की पूजा की बात तो आपने अक्सर सुना या देखा ही होगा. लेकिन भारत में एक ऐसा भी मंदिर हैजहां एक देवी के योनि की पूजा की जाती है. ये हैं आसाम स्थित कामख्या मंदिर जहां योनी की पूजा होती है.साधारण महिलाओं की तरह इस योनी से पीरियड के दौरान लगातार कई दिनों तक खून भी बहता जिसे भक्त प्रसाद के रूप में ग्रहण भी करते है.

कामाख्या शक्तिपीठ गुवाहाटी के पश्चिम में 8 कि.मी. दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है. मान्यताओं के मुताबिक़ के मुताबिक जब राजा दक्ष ने जब भगवान शिव को महायज्ञ में न्योता नहीं दिया तब भगवान भोले शंकर की पत्नी और दक्ष के बेटी इने स बात से नाराज होकर यज्ञ में अपनी आहुति दे दी. . जिसके बाद भगवान शिव मृत शरीर को लेकर तांडव करने लगे. माता सती के प्रति भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 52 भाग कर दिया. जिस-जिस जगह पर माता सती के शरीर के अंग धरती पर गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए. कहा जाता है कि यहां पर माता सती का गुह्वा मतलब योनि भाग गिरा था. जहां कामाख्या महापीठ की उत्पत्ति हुई. कहा जाता है यहां देवी का योनि भाग होने की वजह से यहां माता रजस्वला यानी सामान्य स्त्री की तरह मासिक धर्म वाली होती हैं. मान्यताओं के मुताबिक सभी शक्तिपीठों में से कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम कहा जाता है.

कामख्या मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है. मंदिर में एक कुंड सा है, जो हमेशा फूलों से ढ़का रहता है. इस जगह से पास में ही एक मंदिर है जहां पर देवी की मूर्ति स्थापित है. यह पीठ माता के सभी पीठों में से माहापीठ माना जाता है. कहा जाता है कि इस जगह पर माता के योनि भाग गिरा था, जिस वजह से यहां पर माता हर साल तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं. इस दौरान मंदिर को बंद कर दिया जाता है. तीन दिनों के बाद मंदिर को बहुत ही उत्साह के साथ खोला जाता है.यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं. कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आस-पास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है. तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र लाल रंग से भीगा होता है. बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है.

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