जब एक मुस्लिम की हत्या का बदला लेने एकजुट हुआ मराठा साम्राज्य

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इब्राहीम ख़ाँ गार्दी एक भाड़े का सैनिक था, जिसे ब्रिटिश सेनाधिकारी ब्रसी ने स्वयं प्रशिक्षित किया था।अपनी योग्यता के बल पर इब्राहीम ख़ाँ शीघ्र ही ब्रिटिश तोपख़ाने का प्रधान हो गया।1757 ई. में उसने निज़ाम की नौकरी कर ली थी. मराठों और निजाम के बीच हुई संधि के कारण गार्दी पेशवा की सेवा में महाराष्ट्र चला गया।उसने 1760 ई. में उदगिर की लड़ाई में निज़ाम की फ़ौजों के ख़िलाफ़ मराठों को विजय बनाने में भारी योगदान दिया था।गार्दी पानीपत की तासरी लड़ाई में 9000 सिपाहियों तथा 40 तोपों के साथ मराठों की ओर से लड़ा। शुरुआत में उसने अपने अचूक निशाने से शत्रु की फ़ौजों को पछाड़ दिया, लेकिन अन्त में इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई।विजयी अफ़ग़ानों द्वारा गार्दी बन्दी बना लिया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। पानीपत की लड़ाई से पहले अब्दाली मराठों की ताकत को आंकने में जुटा था। इसी दौरान उसे इब्राहिम खां गार्दी के बारे में पता चला। गार्दी मराठों के तोपखाने का कुशल सेनापति था और उसका निशाना दुश्मनों के लिए भय का कारण था.अब्दाली ने मुस्लिम धर्म का वास्ता देकर पहले तो गार्दी को अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की लेकिन जब गार्दी नहीं माने तो उसने अशर्फियों की थैली देकर गार्दी को मनाने के लिए अपना दूत भेजा। युद्धभूमि में गार्दी के शिविर में एक सैनिक आया और उन्हें सलाम कर बोला – ‘हुजूर! मैं बादशाह अहमदशाह अब्दाली का दूत हूं।

उनकी ओर से आपके लिए एक पैगाम लेकर आया हूं। यदि आप युद्ध में उनका साथ देंगे तो आप न सिर्फ अपने मजहब की खिदमत करेंगे, बल्कि ऊंचे ओहदे और अतुलित धन-संपत्ति से नवाजे जाएंगे। फिलहाल उनकी ओर से यह तोहफा कबूल करें।’ यह कहते हुए अशर्फियों से भरा एक थैला उसने गार्दी के पैरों के पास रख दिया। गार्दी ये सुनते ही क्रोध से लाल-पीला हो गया और दूत को धमकाते हुए बोला – ‘यदि तुम दूत न होते, तो तुम्हारा सिर यहीं कलम कर देता। तुम मुल्क के ही नहीं, दीन के भी दुश्मन हो। मुझे एक विदेशी लुटेरे अब्दाली का साथ देने के लिए तोहफा दे रहे हो, जिसने हजारों निर्दोष लोगों का निर्दयता से कत्ल करवा दिया। तुम इसे मजहब की खिदमत कहते हो। अपने वतन के साथ गद्दारी को मैं मजहब और दीन के साथ गद्दारी मानता हूं।’सैनिक भयभीत हो अशर्फियां उठाकर भाग गया। गार्दी सच्चे देशभक्त थे। उनके नेतृत्व में मराठा तोपखाने ने अहमदशाह अब्दाली की सेना पर कहर बरपा दिया।लेकिन अंततः इस युद्ध में मराठों की हार हुई और गार्दी को बंदी बना लिया गया।

युद्ध के बाद अब्दाली ने गार्दी को अपने सामने पेश करने का हुक्म दिया। घायल गार्दी को जंजीरों से बुरी तरह जकड कर लाया गया। अब्दाली ने उन्हें फिर से प्रलोभन देते हुए अपनी सेना में शामिल होने को कहा। गुस्से में गार्दी ने अब्दाली पर थूक दिया। क्रोध में उबलते अब्दाली ने गार्दी के पहले तो हाथ कटवाये फिर जुबान कटवाई और फिर उनकी ह्त्या करवा दी। भारत के एक सच्चे मुस्लिम सपूत की इस भयानक ह्त्या ने खुद अब्दाली के चेहरे पर ऐसी कालिख पोती कि आज भी भारत का मुस्लिम हो या हिन्दू अब्दाली का नाम सुनकर एक बार थूकता जरूर है.

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