सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं चाहते थे नेहरू, राजेंद्र प्रसाद ने दिखाई थी राष्ट्रपति पद की ताकत

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सोमनाथ मन्दिर जिसे सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, गुजरात (सौराष्ट्र) के काठियावाड़ क्षेत्र के प्रभास में विराजमान हैं. प्राचीन भारतीय इतिहास और आधुनिक भारत के इतिहास में भी सोमनाथ मन्दिर को सन् 1024 में महमूद ग़ज़नवी ने भ्रष्ट कर दिया था. उसने सोने-चाँदी को लूटने के लिए उसने मन्दिर में तोड़-फोड़ की थी. मन्दिर के हीरे-जवाहरातों को लूट कर वह अपने देश ग़ज़नी लेकर चला गया. बताया जाता है कि जब महमूद ग़ज़नवी उस शिवलिंग को नहीं तोड़ पाया, तब उसने उसके अगल-बगल में भीषण आग लगवा दी. सोमनाथ मन्दिर में नीलमणि के छप्पन खम्भे लगे हुए थे. उन खम्भों में हीरे-मोती तथा विविध प्रकार के रत्न जड़े हुए थे. उन बहुमूल्य रत्नों को लुटेरों ने लूट लिया और मन्दिर को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया. महमूद ग़ज़नवी के मन्दिर लूटने के बाद राजा भीमदेव ने पुनः उसकी प्रतिष्ठा की.

आज़ादी से पहले जूनागढ़ रियासत के नवाब ने 1947 में पाकिस्तान के साथ जाने का फ़ैसला किया था. भारत ने उनका ये फ़ैसला स्वीकार करने के इनकार कर दिया और उसे भारत में मिला लिया गया. भारत के तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ पहुंचे.उन्होंने भारतीय सेना को इस क्षेत्र को स्थिर बनाने निर्देश दिए और साथ ही सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया. सरदार पटेल, केएम मुंशी और कांग्रेस के दूसरे नेता इस प्रस्ताव के साथ महात्मा गांधी के पास गए.

महात्मा गांधी ने इस फ़ैसले का स्वागत किया, लेकिन ये भी सुझाव दिया कि निर्माण के खर्च में लगने वाला पैसा आम जनता से दान के रूप में इकट्ठा किया जाना चाहिए, ना कि सरकारी ख़ज़ाने से दिया जाना चाहिए.लेकिन इसके कुछ वक़्त बाद ही महात्मा गांधी की हत्या हो गई और सरदार पटेल भी नहीं रहे. मंदिर को दुरुस्त करने की ज़िम्मेदारी केएम मुंशी पर आ गई जो नेहरू सरकार में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री थे.साल 1950 के अक्टूबर में सोमनाथ मंदिर के ख़स्ताहाल हिस्सों को ढहाया गया और वहां मौजूद मस्जिद के जैसे ढांचे को कुछ किलोमीटर दूर सरकाया गया. केएम मुंशी के निमंत्रण पर मई, 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर पहुंचे.


नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को वहां ना जाने की सलाह दी थी. उनका मानना था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और राष्ट्रपति के किसी मंदिर के कार्यक्रम में जाने से ग़लत संकेत जाएगा. हालांकि, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उनकी राय नहीं मानी.नेहरू ने ख़ुद को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण से अलग रखा था और सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र तक लिखा था. उन्होंने कहा था कि सोमनाथ मंदिर परियोजना के लिए सरकारी फ़ंड का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. क़रीब 70 बरस पहले हुई घटना आज सियासी बवाल मचा रही है, क्योंकि गुजरात में चुनाव प्रचार कर रहे राहुल गांधी मंदिरों का दौरा कर रहे हैं और सोमनाथ मंदिर जाने का उनका फ़ैसला भाजपा के गले नहीं उतर रहा.

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