पोरस-सिकंदर महायुद्ध : भारत विजय की ख्वाहिश ने ले ली विश्व विजेता की जान

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1988

सिकंदर उर्फ़ एलेक्सजेंडर का नाम आते ही एक महान योद्धा और नेक राजा की छवि सामने आ जाती है लेकिन ये हकीकत नहीं है. सिकंदर एक क्रूर ,महत्वाकांक्षी और दुस्साहसी इंसान था जिसकी वजह से उसने अपने आस-पास के राज्यों पर चढ़ाई कर उसे जीत लिया. सिकंदर को अपनी जीतों से घमंड होने लगा था । वह अपने को ईश्वर का अवतार मानने लगा और अपने को पूजा का अधिकारी समझने लगा। अपने इसी दम्भ के कारण उसने भारत पर आक्रमण कर दिया लेकिन ये उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई और यही उसकी मौत का कारण बना।

सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने सौतेले व चचेरे भाइयों को कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया के सिंहासन पर बैठा था। उसके गुरु अरस्तु ने उन्हें बताया था कि उसका जन्म पूरी दुनिया पर राज करने के लिए हुआ है. इसी महत्वाकांक्षा के कारण सिकंदर विश्व विजय को निकला। अपने आसपास के विद्रोहियों का दमन करके उसने इरान पर आक्रमण किया, इरान को जीतने के बाद गोर्दियास को जीता । गोर्दियास को जीतने के बाद उसने बेबीलोन को जीतकर पूरे राज्य में आग लगवा दी। बाद में अफगानिस्तान के क्षेत्र को रोंद्ता हुआ सिन्धु नदी तक चढ़ आया। सिन्धु को पार करने के बाद भारत के तीन छोटे छोटे राज्य थे। तक्षशिला जहाँ का राजा आम्भी था, पोरस, और अम्भिसार का राज्य काश्मीर के चारो तरफ फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था, इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया।

अम्भिसार ने भी तटस्थ रहकर सिकंदर की राह छोड़ दी, राजा पुरु ने सिकंदर से दो-दो हाथ करने का निर्णय कर लिया। सिकंदर झेलम के दूसरी और पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेलम नदी के एक द्वीप में पहुच गया। पुरु के सैनिक भी उस द्वीप में तैरकर पहुच गए। उन्होंने यूनानी सैनिको के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिको को मार डाला गया। बचे कुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब कर मर गए। बाकी बची अपनी सेना के साथ सिकंदर रात में नावों के द्वारा हरनपुर से 60 किलोमीटर ऊपर की और पहुच गया। और वहीं से नदी को पार किया। वहीं पर भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में पुरु का बड़ा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ।

पुरु के पुत्र ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोडे बुसे फेलास को मार डाला। लेकिन अँधेरे में उसके हाथी दल-दल में फंस गए। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोडे न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। सिकंदर अब ऐसे स्थानों की खोज में लग गए जहाँ इनको शरण मिल सके। सिकंदर ने छोटे शस्त्रों से सुसज्जित सेना को हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिढ़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पावों तले कुचलना शुरू कर दिया। हाथियों में अपार बल था, और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों के तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिको को चूर-चूर कर दिया।कहा जाता है की पुरु ने अनाव्यशक रक्तपात रोकने के लिए सिकंदर के सामने अकेले ही निपटने का प्रस्ताव रखा परन्तु सिकंदर ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। बाद में सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि में लडाई को आगे जारी रखा गया ये उसका आख़िरी युद्ध साबित हो सकता है. अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की। राजा पुरु मान गए भारतीय परम्परा के अनुसार पुरु ने शत्रु का वध नही किया। संधि यह की गयी की राजा पुरु सिकंदर को जीवनदान देंगे बदले में सिकंदर से वचन लिया गया कि वो फिर कभी भारत पर हमला नहीं करेगा. तब सिकंदर ने पुरु से वापस जाने की आज्ञा मांगी।

पुरु ने सिकंदर को अपने प्रदेश से दक्खिन की तरफ से जाने का मार्ग दिया। जिन मार्गो से सिकंदर वापस जा रहा था,उसके सैनिको ने भूख के कारण राहगीरों को लूटना शुरू कर दिया। परंतु इसी वापसी में मालवी नामक एक छोटे से भारतीय गणराज्य ने सिकंदर की लूटपाट का विरोध किया।इस लडाई में सिकंदर बुरी तरह घायल हो गया। भारत में सबसे अधिक खूंखार लड़ाकू माने जाने वाले मलावी लोगो के द्वारा सिकंदर के टुकड़े टुकड़े होने ही वाले थे, उनकी तलवारे व भाले सिकंदर के कवचों को भेद गए थे और सिकंदर को बुरी तरह से घायल हो चुका था. शत्रु का एक तीर उसका बख्तर पार करके उसकी पसलियों में घुस गया। सिकंदर घुटनों के बल गिर गया। शत्रु उसका शीश उतारने ही वाले थे की प्युसेस्तास व लिम्नेयास आगे आए। किंतु उनमे से एक तो मार दिया गया तथा दूसरा बुरी तरह घायल हो गया। इस लड़ाई में सिकंदर की गर्दन पर एक लोहे की लाठी का प्रहार हुआ और सिकंदर अचेत हो गया। उसके सैनिक उसी अवस्था में सिकंदर को निकाल ले गए।

भारत में सिकंदर का संघर्ष सिकंदर की मौत का कारण बन गया। अपने देश वापस जाते हुए वह बेबीलोन में रुका। भारत विजय करने का उसका घमंड चूर चूर हो गया। इसी कारण वह अत्यधिक मद्यपान करने लगा, तीर का घाव फैलता गया और वो ज्वर से पीड़ित हो गया। और कुछ दिन बाद उसी ज्वर ने उसकी जान ले ली। सिकंदर की मौत के विषय में यह भी कहा जाता है की राजा पुरु से युद्ध के समय एक हार के बाद यूनानी सैनिक ने आम्भी से लड़ने से मना कर दिया। आम्भी ने भारत में सिकंदर की जीत का मार्ग प्रशस्त किया था. नन्द की 2.5 लाख की सेना से डरे सिकंदर की सेना ने लड़ने से मना कर दिया. अपनी सेना के विरोध के बाद सिकंदर ने भी हथियार डाल दिए थे लेकिन अपनी राजधानी पहुचने के बाद उसने नन्द से लड़ने की तैयारी शुरू कर दी पर संघ और सेना को ये पसंद नहीं आया । वे भारत जैसे भीमकाय शक्तिशाली राष्ट्र पर आक्रमण कर सब कुछ गवाना नहीं चाहते थे। यदि युद्ध होता तो जो धन सिकंदर फारस से जीता था उसे यूनान भेजने के बजाय युद्ध में लगा देता और ये संघ को और सैनिको को मंजूर नहीं था इसीलिए 323 ईसापूर्व में सिकंदर और उसके एकलौते बेटे सिकंदर चतुर्थ की हत्या कर दी गयी।

 

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