Noor Jahan:गिड़गिड़ा रहा था बादशाह,मेहरुन्निसा ने तोहफे में दे दी जवानी

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बला की खूबसूरत नूरजहां का असली नाम मेहरून्निसा था. मुगल बादशाह अकबर के लाड़ले बेटे शाहजादा सलीम उर्फ जहांगीर ने नूरजहां काे सबसे पहले एक बगीचे में देखा था और देखते ही अपनी सुध-बुध खो बैठा़ मेहरून्निसा पर जहांगीर फिदा हो गया और उसने निश्चय किया कि वह उसी से शादी करेगा.

मेहरून्निसा एतिमातुद्दौला की बेटी थी. जहांगीर ने मेहरून्निसा से अपनी शादी के लिए अपने पिता अकबर के पास संदेश भेजा, लेकिन अकबर तैयार नहीं हुए़ यही नहीं, मेहरून्निसा के पिता को भी यह रिश्ता मंजूर नहीं था़ एतिमातुद्दौला ने मेहरून्निसा की शादी अपने भतीजे अलीगुल से कर दी. यही अलीगुल, बिना किसी औजार की सहायता के शेर को मारने के कारण आगे चल कर शेर अफगान के रूप में मशहूर हुआ़ शादी के बाद मेहरून्निसा और अलीगुल बंगाल में रहने लगे. मुगल सल्‍तनत में बंगाल की जागीर शेर अफगान अलीगुल के पास थी.
अकबर की मौत के बाद जहांगीर जब गद्दी पर बैठा, तो उसने सबसे पहले मेहरून्निसा को पाने की कोशिशें तेज कर दीं. पहले उसने मेहरून्निसा को समझाने की कोशिश की कि वह अपने पति अलीगुल को तलाक देकर उससे निकाह कर ले, लेकिन मेहरून्निसा नहीं मानी. शेर अफगान की मौत के बाद मेहरून्निसा अकबर की बेवा सलीमा बेगम की सेवा में नियुक्त हुई. जहांगीर तो इसी इंतजार में था.

उसने मेहरून्निसा को आगरा के अपने शाही हरम में बुलवा लिया. जहांगीर ने उसे शादी के लिए राजी करने की बहुत कोशिश की लेकिन मेहरून्निसा नहीं मानी. जहांगीर उसके समक्ष प्रेम की भीख मांगता रहा और वह नहीं पसीजी. मेहरून्निसा के प्‍यार में दीवाने जहांगीर के कारण राज का कामकाज ठप हो चुका था. दरबार लगना बंद हो गया था. आखिरकार प्रमुख दरबारी मेहरून्निसा के पास पहुंचे और उसे राज्‍य की भलाई के लिए जहांगीर से शादी करने के लिए मनाने लगे. मेहरून्निसा मान गयी. सन 1611 में जहांगीर के साथ उसकी शादी हुई. शादी के बाद जहांगीर ने मेहरून्निसा को ‘नूरजहां’ के खिताब से नवाजा.

कहते हैं कि नूरजहां से शादी करने के बाद जहांगीर हर वक्‍त उसकी जुल्‍फों के साये और शराब की मदहोशियों में डूबा रहता था. इसका नतीजा यह हुआ कि सत्ता की पूरी बागडोर नूरजहां के हाथों में आ गयी थी़ इतिहासकार डॉ बेनी प्रसाद कहते हैं कि नूरजहां राजनीतिक पैंतरों में काफी कुशल समझी जाती थी़ जब जहांगीर का दरबार लगता तो नूरजहां सिंहासन के पीछे जहांगीर की पीठ पर हाथ रख कर बैठती थी. जब तक वह नूरजहां का हाथ अपनी पीठ पर पाता, तब तक वह सही फैसले सुनाता रहता था और ज्‍ौसे ही नूरजहां उसकी पीठ से हाथ हटा लेती, वह दरबार बरखास्‍त कर देता था. इतिहास में नूरजहां को साहसी महिला के रूप में जाना जाता है, जो जहांगीर के साथ सत्ता की सारी बागडोर संभालती थी.

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