मणिकर्णिका घाटऔर झाँसी की रानी का इतिहास

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 आखिर झाँसी की रानी पर बनी इस फिल्म का मणिकर्णिका क्यों रखा गया? मणिकर्णिका और झाँसी की रानी में क्या समानताएं है? यह जानने से पहले दोस्तों आपको बता दें कि फिल्म मणिकर्णिका की कहानी बाहुबली फेम और जाने माने लेखक के वी विजयेंद्र ने लिखी है। कई लोग इस बात को लेकर असमंजस में होंगे कि आखिर झाँसी की रानी पर बेस्ड फिल्म का नाम मणिकर्णिका क्यों है? तो आपको इसके लिए इतिहास के पन्ने खंगालने होंगे। दरअसल 1857 की नायक रहीं वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 1828 में बनारस में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। रानी लक्ष्‍मीबाई का बचपन बनारस के तुलसी घाट के बगल अस्सी और रीवा घाट पर बीता। यहीं पर मणिकर्णिका घाट मौजूद है। रानी लक्ष्मी बाई ने यहीं घुड़सवारी और तलवारबाजी भी सीखी। बाद में जीवन में कई उतार चढ़ाव आये। बच्चे को खोया, फिर पति को खोया, फिर राजपाट खोया। हालाँकि उन्होंने आत्मबल कभी नहीं खोया।

अब आपको बनारस के मणिकर्णिका घाट से जुड़ी दो कथाएं बताते हैं। एक के अनुसार भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या करते हुए अपने सुदर्शन चक्र से यहां एक कुण्ड खोदा था। उसमें तपस्या के समय आया हुआ उनका स्वेद भर गया। बताते है जब शिव वहां प्रसन्न हो कर आये तब विष्णु के कान की मणिकर्णिका उस कुंड में गिर गई थी।

इसी तरह दूसरी कथा के अनुसार भगवाण शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नहीं मिल पाती थी। इस वजह से देवी पार्वती इससे परेशान हुईं और शिवजी को रोके रखने हेतु के लिए अपने कान की मणिकर्णिका वहीं छुपा दी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा। जब शिवजी उसे ढूंढ नहीं पाये और आज तक जिसकी भी अन्त्येष्टि उस घाट पर की जाती है, वे उससे पूछते हैं कि क्या उसने देखी है?

वहीं यहाँ यह किस्सा भी मशहूर है कि प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही चाण्डाल था, जिसने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीदा था। उसने राजा को अपना दास बना कर उस घाट पर अन्त्येष्टि करने आने वाले लोगों से कर वसूलने का काम दे दिया था।

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