क्या वाकई रानी लक्ष्मीबाई का किसी अंग्रेज से प्रेम सबंध था !

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संजय लीला भंसाली की पद्मावत के बाद कंगना रनौत की फिल्म ‘मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी’ पर बवाल खड़ा हो गया है. राजस्थान में सर्व ब्राह्मण महासभा ने फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई की छवि को धूमिल करने का आरोप लगाया है. आरोप है कि फिल्म में लक्ष्मीबाई और एक अंग्रेज के बीच रागात्मक संबंधों का जिक्र किया गया है। रानी लक्ष्मी बाई को लेकर ऐसा विवाद पहले भी सामने आ चुका है यूके बेस्ड लेखिका जयश्री मिश्रा ने ‘रानी’ नाम की किताब लिखी थी जिसमें उन्होंने अपनी किताब में रानी और झांसी के तत्कालीन राजनीतिक एजेंट रॉबर्ट एलिस के बीच अफेयर का जिक्र किया. वैसे परम्परागत इतिहास की पुस्तकों में लक्ष्मीबाई के बारे में इस तरह का जिक्र नहीं मिलता है. हालांकि कुछ साल पहले एक अंग्रेजी में एक किताब आई थी, जिसमें लक्ष्मीबाई के एक अंग्रेज के साथ प्रेम प्रसंग को पेश किया गया था. लेकिन अंग्रेजों द्वारा लिखे गए भारत के इतिहास पर तो खुद अंग्रेज भी भरोसा नहीं करते.

जयश्री ने अपनी किताब में लिखा कि लक्ष्मीबाई के साथ बढ़ती दोस्ती के चलते रॉबर्ट एलिस की शिकायत ईस्ट इंडिया कंपनी तक पहुंची. जिसके कारण रॉबर्ट को इस्तीफा तक देना पड़ा. वहां से इस्तीफा देने के बाद वह रानी लक्ष्मीबाई के दरबार में आए. लक्ष्मीबाई को जब रॉबर्ट के जाने का पता चला तो वह खूब रोईं.जयश्री की किताब में एक जगह रॉबर्ट और लक्ष्मीबाई की पहली मुलाकात का जिक्र है. इसके मुताबिक़ रॉबर्ट ने जब रानी लक्ष्मीबाई की पहली मुस्कान देखी तो वह मंत्रमुग्ध हो गया था.ये तो सर्वविदित है कि रानी लक्ष्मी बाई को निकट से देखने का मौक़ा आजतक केवल दो अंग्रेज को मिला। रानी लक्ष्मी बाई के सन्दर्भ में रॉबर्ट एलिस का जिक्र आजतक कहीं नहीं मिलता। इसलिए जयश्री की किताब को तथ्यों पर आधारित नहीं माना जा सकता।

अंग्रेज़ों की तरफ़ से कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स पहला शख़्स था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आँखों से लड़ाई के मैदान में लड़ते हुए देखा.उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दाँतों से दबाई हुई थी. वो दोनों हाथों से तलवार चला रही थीं और एक साथ दोनों तरफ़ वार कर रही थीं.उनसे पहले एक और अंग्रेज़ जॉन लैंग को रानी लक्ष्मीबाई को नज़दीक से देखने का मौका मिला था, लेकिन लड़ाई के मैदान में नहीं, उनकी हवेली में. जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने अवैध घोषित कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा था.रानी ने वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं थी. कुछ इतिहासकार भी मानते हैं कि अंग्रेजों में जॉन लैंग ही ऐसा पहला शख्स था जिनसे खुद रानी बात किया करती थी.लेकिन उन्हें भी रानी को देखने का सौभाग्य केवल एक बार ही नसीब हुआ।

जब लैंग पहली बार झाँसी आए तो रानी ने उनको लेने के लिए घोड़े का एक रथ आगरा भेजा था.झाँसी पहुंचने पर लैंग को पचास घुड़सवार एक पालकी में बैठा कर ‘रानी महल’ लाए जहाँ के बगीचे में रानी ने एक शामियाना लगवाया हुआ था.जहाँ उनकी रानी से मुलाकात होनी थी। लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं. तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया. लैंग की नज़र रानी के ऊपर गई. बाद में रेनर जेरॉस्च ने एक किताब लिखी, ‘द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.’किताब में रेनर जेरॉस्च ने जॉन लैंग को कहते हुए बताया, ‘रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं. अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था. मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था. हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थी और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी.उनका रंग बहुत गोरा नहीं था. उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था, सिवाए सोने की बालियों के. उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें उनके शरीर का रेखांकन साफ़ दिखाई दे रहा था.. जो चीज़ उनके व्यक्तित्व को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़.’

रानी लक्ष्मी बाई के व्यक्तित्व को लेकर इससे ज्यादा वर्णन कहीं नहीं मिलता। जयश्री की किताब एक कठोर वीरांगना के भीतर नारी की कोमल भावनाएं तलाश करने की फिक्शनल कोशिश रही होगी अगर इसे ही ऐतिहासिक तथ्य मानकर पेश किया जाए तो ये हिमाकत के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन इसपर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

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