The Ghost of Gold Train :जार निकोलस का 500 टन सोना लेकर गायब हो गई ट्रेन

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पहले विश्व युद्ध के बाद रूस में बोल्शेविक क्रांति हो गई थी. लेनिन और उनके कमांडर लियोन ट्रॉटस्की ने रूस के बादशाह ज़ार निकोलस द्वितीय की सेनाओ को कई जगह करारी हार का सामना करना पडा. विद्रोहियों को पता था कि जार के पास सोने का अकूत भण्डार है इसलिए वो इसे हथियाना चाहते थे.ज़ार के सलाहकारों ने उन्हें सलाह दी कि वो अपने ख़ज़ाने को राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग से पूर्वी इलाक़े में कहीं भेज दें, वरना वो क्रांतिकारियों के हाथ लग जाएंगे.ज़ार निकोलस की समर्थक व्हाइट फोर्सेज ने क़रीब पांच सौ टन सोना एक ट्रेन में लादकर सेंट पीटर्सबर्ग से पूर्वी शहर कज़ान की तरफ़ रवाना कर दिया. इस बात की ख़बर लेनिन के कमांडर लियोन ट्रॉटस्की को लग गई. ट्रॉटस्की कज़ान जा पहुंचा. वहां पर ट्रॉटस्की की सेना ने ज़ार समर्थक व्हाइट फ़ोर्सेज को शिकस्त दे दी. मगर जब वो कज़ान शहर के अंदर दाखिल हुए तो पता चला कि सोना तो वहां नहीं था. उसे और पूरब की तरफ़ रवाना कर दिया गया था.

ट्रॉटस्की ने दूसरी ट्रेन से सोने से लदी गाड़ी का पीछा करना शुरू कर दिया था. ये लुकाछिपी कई महीनों तक जारी रही. साइबेरियाई इलाक़े में सोने से लदी ट्रेन को ज़ार के नए कमांडर अलेक्ज़ेंडर कोलचाक ने अपने क़ब्ज़े मे ले लिया. ख़ज़ाने वाली ट्रेन जब इर्कुटस्क शहर पहुंची तो उसे वहां मौजूद चेक सैनिकों ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया. ये चेक फौजी, पहले विश्व युद्ध में रूस की तरफ़ से लड़ने के लिए आए थे. जंग के दौरान ही रूस में क्रांति हो गई. जिस वजह से ये सैनिक वहीं फंस गए थे. इन सैनिकों को घर जाने की जल्दी थी.उन्होंने सोने से लदी ट्रेन को कोलचाक के क़ब्ज़े से छीन लिया. कहा जाता है कि उन्होंने ये ट्रेन बोल्शेविक लड़ाकों यानी कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को सौंप दी. उन्होंने कोलचाक को भी ट्रॉटस्की के सैनिकों के हवाले कर दिया. इसके बदले में चेक सैनिकों ने ट्रॉटस्की से अपने वतन वापस जाने की इजाज़त मांगी, जो उन्हें मिल गई. कुछ क़िताबें कहती हैं कि ट्रॉटस्की ज़ार के पूरे ख़ज़ाने को मॉस्को ले आया. उसने ज़ार के कमांडर कोलचाक को गोली मार दी थी. हैरानी की बात ये है कि ये खजाना फिर कभी रूस के हाथ लगा ही नहीं .पूरी की पूरी ट्रेन 500 TAN सोने के साथ कहाँ गायब हो गयी.

इस घटना को सौ साल बीत चुके हैं. क़रीब एक सदी से ख़ज़ाने को लेकर तरह तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं. 2009 में बैकाल झील में गोताखोरों ने डुबकी लगाकर डूबी हुई ट्रेन तलाशने की कोशिश की थी, उन्हें ट्रेन के डिब्बे और कुछ चमकती हुई चीज़ें मिली थीं. मगर वो उसे निकालकर बाहर नहीं ला सके. क्योंकि वो चमकती हुई चीज़ झील की गहराई में दरारों में फंसी थी, जहां तक हाथ पहुंचना भी मुश्किल था.आज भी ये एक रहस्य ही है.

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