बाबर ने राणा सांगा के खिलाफ पहली बार दिया था जिहाद का नारा

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जिहाद और जिहादी नारों से आज पूरी दुनिया त्रस्त है .लेकिन ये जिहादी नारा आज का नहीं बल्कि बरसों पुराना जो तैमूर के वंशज बाबर ने भारत के खिलाफ मुसलामानों को संगठित करने के लिए दिया जो अब पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुका है. बाबर ने भारत की अकूत संपदा के बारे में काफी कुछ सुन रखा था .इसलिए जब लोदी साम्राज्य के दुश्मनों जिसमें राणा सांगा भी शामिल ने उसे भारत आने का न्यौता दिया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. राणा की सोच थी कि दिल्ली को रौंद कर लोदियों की शक्ति को क्षीण करके बाबर भी तैमूर की भाँति लौट जायेगा . लेकिन बाबर के भारत में ही रुकने के निर्णय ने परिस्थिति को पूरी तरह से बदल दिया। सिंधु-गंगा घाटी में बाबर द्वारा साम्राज्य की स्थापना से राणा साँगा को ख़तरा बढ़ गया। साँगा ने बाबर को भारत से खदेड़ने, कम-से-कम उसे पंजाब तक सीमित रखने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं। इस तरह जिस राना ने बाबर को भारत बुलाया अब वही उसके खिलाफ हो गया .अपना -अपना वर्चस्व बनाने के लिए दोनों के बीच युद्ध ही एकमात्र विकल्प रह गया था .इस तरह राणा सांगा ने अपने सैनिकों और बाबर के दुश्मनों को संगठित करने का काम शुरू कर दिया .

अफ़ग़ानों ने यह सोच कर राणा साँगा का साथ दिया कि अगर वह जीत गया, तो शायद उन्हें दिल्ली की गद्दी वापस मिल जायेगी। मेवात के शासक हसन ख़ाँ मेवाती ने भी राणा साँगा का पक्ष लिया। लगभग सभी बड़ी राजपूत रियासतों ने राणा की सेवा में अपनी-अपनी सेनाएँ भेजीं।राणा साँगा की प्रसिद्धि और बयाना जैसी बाहरी मुग़ल छावनियों पर उसकी प्रारम्भिक सफलताओं से बाबर के सिपाहियों का मनोबल गिर गया। उनमें फिर से साहस भरने के लिए बाबर ने राणा साँगा के ख़िलाफ़ ‘जिहाद’ का नारा दिया। लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए शराब के घड़े उलट दिए और सुराहियाँ फोड़ दी। उसने अपने राज्य में शराब की ख़रीदफ़रोख़्त पर रोक लगा दी और मुसलमानों पर से सीमा कर हटा दिया।

बाबर और राणा सांगा के बीच 1527 में खानवा के मैदान में ज़बर्दस्त संघर्ष हुआ। साँगा की सेना में 200,000 से भी अधिक सैनिक थे। इनमें 10,000 अफ़ग़ान घुड़सवार और इतनी संख्या में हसन ख़ान मेवाती के सिपाही थे। बाबर की सेना निःसन्देह छोटी थी। साँगा ने बाबर की दाहिनी सेना पर ज़बर्दस्त आक्रमण किया और उसे लगभग भेद दिया। लेकिन बाबर के तोपख़ाने ने काफ़ी सैनिक मार गिराये और साँगा को खदेड़ दिया गया। इसी अवसर पर बाबर ने केन्द्र-स्थित सैनिकों से, जो गाड़ियों के पीछे छिपे हुए थे, आक्रमण करने के लिए कहा। ज़जीरों से गाड़ियों से बंधे तोपख़ाने को भी आगे बढ़ाया गया। इस प्रकार साँगा की सेना बीच में घिर गई और बहुत से सैनिक मारे गये। साँगा की पराजय हुई। राणा साँगा बच कर भाग निकला ताकि बाबर के साथ फिर संघर्ष कर सके परन्तु उसके सामन्तों ने ही उसे ज़हर दे दिया जो इस मार्ग को ख़तरनाक और आत्महत्या के समान समझते थे। इस प्रकार राजस्थान का सबसे बड़ा योद्धा अन्त को प्राप्त हुआ। साँगा की मृत्यु के साथ ही आगरा तक विस्तृत संयुक्त राजस्थान का सपना भी मिट्टी में मिल गया .

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