जब 300 मराठा फ़ौज ने आदिलशाह के 4000 सैनिकों को हराया

0
77

बाजी प्रभु देशपांडे छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना का भूतपूर्व योद्धा था जिसने आदिलशाह के चंगुल में लगभग फंस चुके शिवाजी को अपने प्राणों की बलि देकर निकाला था. पन्हाला गढ़ में चार महीनों तक आदिलशाह की विशाल सेना से युद्ध करने के बाद शिवाजी माहराज अपने किले में ही घिर गए .वहाँ से बाहर निकलने के लिए उन्होंने बाजी प्रभु के साथ मिलकर एक योजना बनाई .योजना तो सफल रही लेकिन बाजी प्रभु को अपने प्राण गंवाने पड़े .

पन्हाला क़िले में शिवाजी के मौजूद होने की खबर सुनते ही आदिलशाह ने अपनी एक विशाल सेना को उनसे लड़ने भेजा . हमला इतना भीषण था कि मराठा सेना को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। वहां से निकलकर बचना शिवाजी के लिए मुश्किल हो गया था। युद्ध कई माह तक चलता रहा। आदिलशाह का प्रबल सेनापति सिद्दी जोहर अपनी जेहादी सेनाओं के द्वारा खूब कहर बरपा रहा था और उसने काफ़ी सफलता भी हासिल की, जब उसने मराठा सेनाओं की रसद और संपत्ति को नष्ट कर दिया।। शिवाजी के कुशल सेनापति नेताजी पालकर ने भी हर संभव प्रयास किया। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. अंततः शिवाजी ने एक अति गोपनीय विकल्प चुना। उन्होंने अपने एक वकील को सिद्दी जोहर के पास इस करार को लेकर भेजा कि हम एक ससमझौता करने के लिए तैयार हैं। यह सुनते ही आदिलशाह की सेनाओं ने कुछ हल्का रुख इख्तियार करा और महीनों से चल रहे संग्राम में एक अल्प विराम आ गया .गया। दरअसल यह शिवाजी की पन्हाला क़िले से अपनी सेनाओं को सुरक्षित बचा लाने की रणनीति का हिस्सा था ।

मौक़ा देखते ही शिवाजी सिद्दी जौहर को चकमा देकर वहां से भाग निकले .पता चलते ही मुग़ल सेनाएं शिवाजी की तलाश में निकल पड़ी। परन्तु तब तक शिवाजी और उनकी सेनाएं वहाँ से काफी दूर निकल चुकी थी। लेकिन मुग़लों की 4000 घुड़सवार सैनिकों ने उन्हें कीन्द दर्रे के पास घेर लिया . यही वह ऐतिहासिक पल था, जब बाजी प्रभु ने अपने ऊपर मुग़लों को पूरी तरह से धूल चटाने की ज़िम्मेदारी ली। उन्होंने अपने साथ कुछ 300 मराठा सैनिकों को लिया और शिवाजी महाराज से आगे बढ़ने के लिए कहा। इस प्रकार वे मुग़लों से लड़कर शिवाजी और उनकी बची हुई सेना को सकुशल विशालगढ़ क़िले तक पहुँचाने में मददगार रहे।

कीन्द में मराठा सूरमाओं ने अपने जौहर का जो सैलाब बरपाया, उसका इतिहास साक्षी है। बाजी प्रभु की सेना की संख्या केवल 300 थी जबकि शत्रु की चार हजार . बाजी प्रभु देशपांडे ने दोनों हाथों में तलवार ली और अपनी पूर्ण शक्ति से मुग़लों को मौत के घाट उतारते रहे। शीघ्र ही उनके तन पर चोटों और घावों की संख्या इतनी बढ़ गयी कि ऐसा लगने लगा मानो कभी भी उनके प्राण तन को त्याग सकते हैं, परन्तु अपने मनो-मस्तिष्क की असीम गहराइयों में समाये उस विश्वास और शक्ति के चलते वे अपनी अंतिम सांस तक लड़ते रहे और जिहादी मुग़लों को छठी का दूध याद दिला दिया। उनका शरीर रक्त से लथपथ और तलवारों और भालों के घावों से छलनी हो गया था। पर वे डटे रहे। वे तब तक डटे रहे, जब तक उन्होंने उन तीन तोपों के दागे जाने की ध्वनि नहीं सुन ली जो शिवाजी के विशालगढ़ क़िले में सुरक्षित पहुँच जाने के चिन्ह के रूप में पूर्व निर्धारित की गई थी.लेकिन ताप दागे जाने तक बाजी प्रभु बुरी तरह घायल हो चुके .जैसे ही उन्होंने तोप की आवाज सुनी उनके प्राण निकल गए .

बाजी प्रभु देशपांडे की वीरगति का समाचार सुनकर शिवाजी का हृदय भर आया। बाजी प्रभु को एक भाव भीनी श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने घोड़ कीन्द दर्रे का नाम पावन कीन्द रखा, जो दर्शाता था कि बाजी प्रभु के रक्त से वह पावन हो चुका था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here