Humayun-Rani Karnavati:जब अपने पिता के दुश्मन की पत्नी की मदद करने पहुंचा बादशाह हुमायूँ

0
63

मेवाड़ साम्राज्य के महानायक राणा सांगा और मुग़ल साम्राज्य के जनक बाबर की दुश्मनी के बारे में कौन नहीं जानता . 1526 ईसवी में जब बाबर ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया, तब राणा संग्राम सिंह उर्फ़ राणा सांगा ने इस विदेशी आक्रान्ता के खिलाफ राजपूत राजाओं को एकत्रित किया और बाबर पर धावा बोला । लेकिन 1527 में खानुआ की लड़ाई में, यह संयुक्त हिंदू शक्ति बाबर के तोपखाने से पराजित हो गई | बहादुरी से लड़ते हुए राणा सांगा के शरीर पर 80 घाव आये, और देश धर्म की बलिवेदी पर उनका बलिदान हुआ । बाबर के बाद उनका बेटा हुमायूँ ने सत्ता की डोर संभाली .हुमायूं ने सांगा की पत्नी को अपनी बहन बनाकर पूरे भारत के इतिहास में ऐसी मिसाल कायम की जिसे हिन्दू-मुस्लिम की महजबी एकता की मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है.

राणा सांगा की धर्मपत्नी थीं रानी कर्णवती । वह चित्तौड़गढ़ के अगले दो राणा, राणा विक्रमादित्य और राणा उदय सिंह की माता और महान महाराणा प्रताप की दादी थी। 1527 से 1533 तक अपने अल्पवयस्क बड़े पुत्र विक्रमादित्य के संरक्षक के रूप में उन्होंने ही राजकाज संभाला । इसी दरम्यान गुजरात के शासक बहादुर शाह द्वारा मेवाड़ पर हमला किया गया । राणा सांगा के बाद सिसौदिया वंश के अन्य परिजन अल्पवयस्क राणा के आधीन रहने को तैयार नहीं थे | किन्तु महारानी कर्णावती ने उन्हें सिसौदिया वंश की खातिर युद्ध करने हेतु मनाया । उन लोगों ने शर्त रखी कि युद्ध के दौरान राणा सांगा के दोनों बेटे व्यक्तिगत सुरक्षा की दृष्टि से बुंदी जायें। इसी दौरान वह प्रसंग भी हुआ, जिसने पन्ना धाय को इतिहास में अमर कर दिया |

रानी कर्णावती अपने बेटों को बूंदी भेजने को राजी हो गईं तथा उन्होंने अपनी भरोसेमंद दासी पन्ना दाई को उनकी जिम्मेदारी सोंपी | सत्ता की हवस में बच्चों के चाचाओं ने ही उनकी जान लेने का प्रयत्न किया | किन्तु पन्ना धाय ने राजकुमार के स्थान पर अपने जिगर के टुकडे अपने इकलौते बेटे को राजकुमार बताकर अपनी आँखों के सामने उसे तलवार से दो टुकड़े होते देखा |

इस घटना से आहत कर्णावती ने तत्कालीन मुग़ल सम्राट हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी.लेकिन हुमायूं जब तक मेवाड़ पहुँचता बहादुर शाह ने चित्तोड़ को घेर लिया। रानी ने पूरी वीरता से उसका सामना किया। अंत में जौहर करने का फैसला हुआ। किले के दरवाजे खोल दिए गए। केसरिया बाना पहनकर पुरुष युद्ध के लिए उतर गए। पीछे से राजपूत औरतें जौहर की आग में कूद गई। 8 मार्च, 1535 को रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई। 3000 छोटे बच्चों को कुँए और खाई में फेंक दिया गया। ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लगे। कुल मिलकर 32000 निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

“बहादुर शाह ने चित्तौड़ को कब्जे में ले रखा था .हुमायूं जब अपनी सेना लेकर वहां पहुंचा तो बहादुरशाह ने उनका रास्ता रोकने की कोशिश की .दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें बहादुरशाह की पराजय हुई .हुमायूँ ने पूरा राज्य कर्णावती के बेटे विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया .

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here