अटल बिहारी बाजपेयी के धोखे के कारण जगजीवन राम नहीं बन पाए भारत के प्रधानमंत्री

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1974 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और जनता पार्टी के रूप में पहली गैर कॉंग्रेसी सरकार वजूद में आई . जनता पार्टी महत्वाकांक्षी बूढों का एक ऐसा संगठन था जिसमें हर शख्स भारत का प्रधानमंत्री बनने के सपने देखा करता था . जनता सरकार में प्रधानमंत्री पद के लिए दौड़ का खेल शुरू हो चुका था. नेतृत्व की दौड़ में थे मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह सबसे आगे थे .

चुनाव परिणाम के बाद बहुत कश्मकश थी कि किसको नेता बनाएं. जनसंघ ने जगजीवन राम को समर्थन देने का फ़ैसला किया था. वो मानते थे कि अगर जगजीवन राम को नेता बनाया गया तो पार्टी को पाँच सालों तक चलाया जा सकता है. दूसरा चौधरी चरण सिंह भी किसी भी सूरत में जगजीवन राम को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे.”लेकिन इस पार्टी को ज्यादातर लोग चरण सिंह को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे.

जब चरण सिंह को पता चला कि त्रिकोणीय मुक़ाबले में जगजीवन राम आगे निकलने वाले हैं तो वो दौड़ से बाहर हो गए और अपना समर्थन मोरारजी देसाई को दे दिया. तभी जनसंघ ने भी जगजीवन राम का साथ छोड़ने का फ़ैसला ले लिया.”जनसंघ के इस निर्णय से जगजीवन राम बुरी तरह नाराज हो गए जिन्हें मनाने का जिम्मा अटल बिहारी बाजपेयी को सौंपा गया .

बाजपेयी के नेत्रित्व में ‘जनसंघ के कुछ नेता उनसे मिलने उनके घर पहुंचे.जैसे ही बाजपेयी ने जगजीवन राम को अपनी पार्टी के स्टैंड की जानकारी दी जगजीवन राम उन पर ज़ोर से चिल्लाने लगे.वाजपेयी रोने लगे और जगजीवन राम की गोद में सिर रख कर उनसे माफ़ी मांगने लगे, लेकिन जगजीवन राम इससे शांत नहीं हुए लेकिन वो अच्छी तरह समझ चुके थे कि प्रधान मंत्री बनने का उनका ख्वाब मिट्टी में मिल चूका है. आखिरकार उन्हें मोरारजी देसाई को अपना नेता मानना ही पडा और इस तरह मोरारजी भाई देसाई भारत के पहले गैर कॉंग्रेसी प्रधानमंत्री बन गए.

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