सम्राट समुद्रगुप्त: भारत का नेपोलियन जिसने अपने जीवन में कभी पराजय का स्वाद नहीं चखा

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हमारे देश में कई वंशों ने शासन किया। लेकिन हर वंश से ऐसा एक शासक निकल आया है, जिसने अपने बहादुरी, न्याय और तेज दिमाग के दम पर इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बना ली।ऐसे ही राजाओं में एक राजा थे समुद्रगुप्त जिन्हें इतिहास ने महान बना दिया। विश्व पटल पर समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन बताया गया है। कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने अपने जीवन में कभी पराजय का स्वाद नहीं चखा। समुद्रगुप्त के बारे मे स्मिथ ने सही कहा है कि समुद्रगुप्त “भारत का नेपोलियन” था।

समुद्रगुप्त गुप्तवंशीय महाराजाधिराज चंद्रगुप्त प्रथम के पुत्र थे. चंद्रगुप्त ने अपने अनेक पुत्रों में से इसे ही अपना उत्तराधिकारी चुना और अपने जीवनकाल में ही समुद्रगुप्त को शासनभार सौंप दिया.समुद्रगुप्त के अन्य भाई इससे रुष्ट हो गए थे और उन्होंने आरंभ में युद्ध छेड़ दिया था। गृहकलह को शांत करने में समुद्रगुप्त को एक वर्ष का समय लगा। इसके पश्चात्‌ उसने दिग्विजययात्रा की। इसका वर्णन प्रयाग में अशोक मौर्य के स्तंभ पर विशद रूप में खुदा हुआ है।

समुद्रगुप्त दक्षिण विजययात्रा पर थी उस समय उत्तर के अनेक राजाओं ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर विद्रोह कर दिया। लौटने पर समुद्रगुप्त ने उत्तर के जिन राजाओं का समूल उच्छेद कर दिया उनके नाम हैं : रुद्रदेव, मतिल, नागदत्त, चंद्रवर्मा, गणपति नाग, नागसेन, अच्युत नंदी और बलवर्मा। इनकी विजय के पश्चात्‌ समुद्रगुप्त ने पुन: पाटलिपुत्र में प्रवेश किया। इस बार इन सभी राजाओं के राज्यों को उसने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। इसके पश्चात्‌ इसकी महती शक्ति के सम्मुख किसी ने सिर उठाने का साहस नहीं किया।

समुद्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में गांधार से लेकर पूर्व में आसाम तक तथा उत्तर में हिमालय के कीर्तिपुर जनपद से लेकर दक्षिण में सिंहल तक फैला हुआ था। अपनी कुशाग्र बुद्धि और संगीत कला के ज्ञान तथा प्रयोग से उसने ऐसें उत्कृष्ट काव्य का सर्जन किया था कि लोग ‘कविराज’ कहकर उसका सम्मान करते थे। समुद्रगुप्त के सात प्रकार के सिक्के मिल चुके हैं, जिनसे उसकी शूरता, शुद्धकुशलता तथा संगीतज्ञता का पूर्ण आभास मिलता है। इसने सिंहल के राजा मेघवर्ण को बोधगया में बौद्धविहार बनाने की अनुमति देकर अपनी महती उदारता का परिचय दिया था। उनके बाद उनके पुत्र सम्राट् चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने उनके वंश को आगे बढ़ाया .

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