हल्दीघाटी का युद्ध :महाराणा का घोड़ा घायल नहीं होता तो बदल जाता भारत का इतिहास

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हल्दीघाटी का युद्ध ना केवल राजस्थान के इतिहास बल्कि हिंदुस्तान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण युद्ध था जिसमे मेवाड़ की आन बचाने के लिए महाराणा प्रताप जबकि राजपूतो को पराजित करने के लिए अकबर की सेना आमने सामने हुयी थी.15 जून साल 1576 को अकबर की बड़ी और ताकतवर सेना के सामने युद्ध के लिए आ गए.महाराणा प्रताप. इतिहासकार जेम्स टॉड के अनुसार हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना में 22,000 सैनिक जबकि अकबर की सेना में 80,000 सैनिक थे महाराणा प्रताप की सेना की अगुआई अफगान योद्धा हाकिम खां सुर ने की थी जिसके परिवार से अकबर का पुराना बैर था जब सुरी वंश के शेरशाह सुरी को मुगलों ने हराया था इसलिए वो प्रताप से मिलकर मुगलों को हराना चाहते थे.

 महाराणा प्रताप की तरफ आदिवासी सेना के रूप में 400-500 भील भी शामिल थे जिसका नेतृत्व भील राजा रांव पूंजा कर रहे थे. भील शुरुवात से ही राजपूतो के स्वामिभक्त रहे थे.

 राजस्थान का इतिहास लिखने वाले जबकि दूसरी तरफ अकबर की सेना का नेतृत्व करने के लिए अकबर ने आमेर के राजपूत राजा मान सिंह को सेनापति बनाकर महाराणा प्रताप से लड़ने को भेजा. ये भी अजब संयोग था कि राजपूत राजपूत से लड़ रहा था.महाराणा प्रताप के लिए सबसे बड़ी दुःख की बात यह थी उनका सगा भाई शक्ति सिंह मुगलों के साथ था और उनको इस पहाड़ी इलाके में युद्ध के लिए रणनीति बनाने में मदद कर रहा था ताकि युद्ध में कम से कम मुगलों का नुकसान हो.21 जून साल 1576 को दोनों की सेनाएं आगे बढ़ी और रक्ततलाई पर दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ जो केवल चार घंटे में ही समाप्त हो गया.

इस युद्ध की सबसे ऐतिहासिक घटना वो थी जब महाराणा प्रताप मान सिंह के करीब पहुँच गये थे और अपने घोड़े चेतक को उन्होंने मानसिंह के हाथी पर चढ़ा दिया और भाले से मान सिंह पर वार किया लेकिन मान सिंह तो बच गये लेकिन उनका महावत मारा गया. चेतक जब वापस हाथी से उतरा तो हाथी की सूंड में लगी तलवार से चेतक का एक पैर बुरी तरह घायल हो गया.चेतक केवल तीन पैरों से 5 किमी तक दौड़ते हुए अपने स्वामी महाराणा प्रताप को रणभूमि से दूर लेकर गया और एक बड़े नाले से चेतक ने छलांग लगाई जिसमें चेतक के प्राण चले गये. उस समय महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह उनके पीछे थे और शक्तिसिंह को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने महाराणा प्रताप की मदद की.

दूसरी तरफ महाराणा प्रताप के रण से चले जाने पर उनके स्थान पर उनके हमशक्ल झाला मान सिंह ने उनका मुकुट पहनकर मुगलों को भ्रमित किया और रण में कूड़े पड़े.मुगल उनको प्रताप समझकर उनपर टूट पड़े और इसमें झाला मान सिंह शहीद हो गये.हल्दीघाटी युद्ध और चेतक की मृत्यु से उनका दिल विचलित हो गया और उन्होंने मुगलों से जीतने तक राजसी सुख त्यागकर जंगलो में जीवन बिताने का निश्चय किया और भविष्य में केवल चित्तोड़ को छोडकर सम्पूर्ण मेवाड़ पर कब्जा किया.

 हल्दीघाटी में स्थित महाराणा प्रताप संग्रहालय में आप उन सभी घटनाओं का चित्रण देख सकते है जो युद्ध के दौरान घटी थी.

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