कैसे टूटी बर्लिन की दीवार

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द्वितीय विश्व युद्ध के ख़त्म होने के बाद बर्लिन शहर की अजीबोगरीब स्थिति बन गई थी.ये टापू जैसे एक शहर में तब्दील हो गया था जिस पर चार मुल्कों का कब्ज़ा था. हरेक मुल्क ने बर्लिन को अपने-अपने सेक्टरों में बांट रखा था.ये चारों मुल्क थे सोवियत संघ, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस.साल 1948 में एक अलग देश वेस्ट जर्मनी को अस्तित्व में लाने की कोशिशें शुरू हुईं और स्टालिन को इसपर एतराज़ था.

स्टालिन ने बदला लेने के लिए उसके सेक्टर से लगने वाले पश्चिमी बर्लिन के हिस्सों को वेस्ट जर्मनी से काट दिया.हालात ऐसे बन गए कि पूर्वी जर्मनी के आस-पास के इलाकों के लिए पश्चिमी बर्लिन स्थाई रूप से गले की हड्डी बन गया और 13 अगस्त, 1961 को पलक झपकते ही चीज़ें नाटकीय रूप से बदल गईं.पूर्वी जर्मनी की तरफ़ बड़े पैमाने पर कंटीले तार लगाने का काम शुरू हो गया, कंक्रीट के पोल जल्दबाज़ी में खड़े कर दिए गए.चार दिनों बाद पश्चिमी जर्मनी की परवाह किए बिना पूर्वी जर्मनी में कंक्रीट से बने ज़्यादा स्थाई ढांचे का निर्माण शुरू कर दिया गया. यही बर्लिन की दीवार थी.एक मुद्दा पूर्वी जर्मनी से पश्चिम की तरफ़ हो रहा पलायन भी था. पूर्वी जर्मनी का हर छठा आदमी पश्चिम जर्मनी चला गया था और ये पलायन बर्लिन के रास्ते हुआ था.बहुत से लोगों ने सीमा पार करने के अनोखे तरीके खोजे – सुरंग बनाकर, गरम हवा के गुब्बारों से, दीवार के ऊपर गुजरती तारों पर खिसककर, या तेज रफ्तार गाड़ियों से सड़क अवरोधों को तोड़ते हुए।

1980 के दशक में सोवियत आधिपत्य के पतन होने से पूर्वी जर्मनी में राजनैतिक उदारीकरण शुरू हुआ और सीमा नियमों को ढीला किया गया। इससे पूर्वी जर्मनी में बहुत से प्रदर्शन हुए और अंततः सरकार का पतन हुआ। 9 नवम्बर 1989 को घोषणा की गई कि सीमा पर आवागमन पर से रोक हटा दी गई है। पूर्वी और पश्चिमा बर्लिन दोनों ओर से लोगों के बड़े बड़े समूह बर्लिन की दीवार को पारकर एक-दूसरे से मिले। अगले कुछ सप्ताहों में उल्लास का माहौल रहा और लोग धीरे-धीरे दीवार के टुकड़े तोड़कर यादगार के लिए ले गए। बाद में बड़े उपकरणों का प्रयोग करके इसे ढहा दिया गया।बर्लिन दीवार के गिरने से पूरे जर्मनी में राष्ट्रवाद का उदय हुआ और पूर्वी जर्मनी के लोगों ने जर्मनी के पुनरेकीकरण के लिए मंजूरी दे दी। 3 अक्टूबर 1990 को जर्मनी फिर से एक हो गया।

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