उर्वशी ने अर्जुन को क्यों दिया नपुंसक होने का श्राप !

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अपने वनवास के समय एक बार पांडव वेदव्यास जी के आश्रम में पहुंचे और उन्हें अपना दुःख बताया। युधिष्ठर ने वेदव्यास जी से प्रार्थना की कि वो उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त करने का कोई उपाय बताए। तब वेदव्यास जी ने कहा की पुनः अपना राज्य प्राप्त करने के लिए तपस्या कर दिव्य अस्त्र प्राप्त करने की सलाह दी. पांडवों में केवल अर्जुन ही देवताओं को प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त करने की क्षमता रखते थे. वेदव्यास जी के ऐसे वचन सुनकर अर्जुन तपस्या करने के लिए आगे अकेले ही रवाना हो गए।

अर्जुन की तपस्या से खुश होकर देवताओं ने अर्जुन को विभिन्न प्रकार के दिव्य एवं अलौकिक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किया . अर्जुन ने देवताओं से प्राप्त हुये दिव्य और अलौकिक अस्त्र-शस्त्रों की प्रयोग विधि सीखा और उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का अभ्यास करके उन पर महारत प्राप्त कर लिया। इंद्र की सलाह पर अर्जुन चित्रसेन नामक गन्धर्व से संगीत और नृत्य की कला सीखने लगे. एक दिन जब चित्रसेन अर्जुन को संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे थे, वहाँ पर इन्द्र की अप्सरा उर्वशी आई और अर्जुन पर मोहित हो गई और उनसे काम वासना शांत करने का आग्रह करने लगी. अर्जुन के मना करने पर उर्वशी ने उन्हें एक वर्ष तक नपुंसक होने का श्राप दे दिया .

इस शाप के कारण ही अर्जुन एक वर्ष के अज्ञात वास के दौरान बृहन्नला बने थे। इस बृहन्नला के रूप में अर्जुन ने उत्तरा को एक वर्ष नृत्य सिखाया था। उत्तरा विराट नगर के राजा विराट की पुत्री थी। अज्ञातवास के बाद उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था।

 

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