जानिये ! किस गद्दार ने भगत सिंह को दिलवाई थी फांसी की सजा

फणीन्द्र नाथ घोष ने सरकारी गवाह के तौर पर सैण्डर्स-वध कांड और असेम्बली बम कांड मंं भी अपनी गवाही दी और इसी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव को आरोपी बनाकर उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई.

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों की सफलता का मूल कारण स्थानीय भेदिये थे जिनकी मदद से अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को या तो पकड़ कर जेल में डाल दिया या फिर उन्हें फांसी पर लटका दिया .भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव जैसे महान क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दिलवाने में जिस गद्दार का सबसे बड़ा हाथ था वो थे बिहार के क्रांतिकारी फणीन्द्र नाथ घोष जो भगत सिंह के सबसे विश्वसनीय साथी हुआ करते थे .लेकिन एक डकैती केस में सजा से बचने के लिए वो सरकारी गवाह बन गए और भगत सिंह के खिल्लाफ कोर्ट में गवाही दे दी जिसके कारण भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव फांसी की सजा सुनाई गई .

काकोरी कांड के बाद, ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन’ पूरी तरह से बिखड़ चुका था. भगत सिंह ने इसे पुनः जीवित करने का बीड़ा उठाया. 1928 में संगठन ने धन-प्रबंध के लिए बेतिया से कुछ दूरी पर स्थित मौलनिया गांव में हरगुन महतो के घर डाका डालने की योजना बनाई गई. क़िस्मत ने यहां भी क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया. डकैती के क्रम में क्रांतिकारी कमलनाथ तिवारी की कुहनी कट गई. खून रूकने का नाम नहीं ले रहा था. इस क्रम में हंगामा भी ज़्यादा मच गया. मजबूरन न चाहते हुए भी एक खून करके भागना पड़ा.इस क्रम में फणीन्द्र नाथ घोष माणिकतल्ला स्थित अपने ननिहाल में गिरफ़्तार कर लिए गए. अब वो सरकारी गवाह बन गए थे. अपने ही लोगों के साथ घोष गद्दारी कर चुके थे. उन्हें लाहौर षड़यंत्र के आरोपियों यानी भगत सिंह, राजगुरू, शुखदेव सहित कमलनाथ तिवारी के ख़िलाफ़ गवाही देने के लिए लाहौर ले जाया गया था. आगे चलकर फणीन्द्र नाथ घोष ने सरकारी गवाह के तौर पर सैण्डर्स-वध कांड और असेम्बली बम कांड मंं भी अपनी गवाही दी और इसी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव को आरोपी बनाकर उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई.
1932 में योगेन्द्र शुक्ल व गुलाब चन्द्र गुलाली दीवाली की रात खुफिया तरीक़े से भाग निकले. जेल से निकलते ही उन्होंने गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष को सज़ा देने की क़सम खा ली. 9 नवम्बर, 1932 को बेतिया के मीना बाज़ार के पश्चिमी द्वार पर पहुंच कर बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह साईकिल से उतरे. एक पान गुमटी पर अपनी साईकिल खड़ी करके फणीन्द्र नाथ घोष की दुकान की ओर बढ़ गए.घोष के दुकान के आस-पास से भीड़ को हटाने के मक़सद से शुक्ल ने पटाखेनुमा हथगोला ज़मीन पर दे मारा. कर्णभेदी धमाका हुआ. धुंए के गुबार में कुछ भी देख पाना असंभव हो गया. इसी मौक़े का फायदा उठाते हुए शुक्ल ने खुखरी निकाल कर घोष पर अंधाधुंध कई वार कर दिए. वार इतने जानलेवा थे कि घोष चीखें मारता ज़मीन पर लोट गया.

बेतिया अस्पताल में क़रीब सप्ताह भर ज़िन्दगी व मौत के बीच जूझते हुए फणीन्द्र नाथ घोष की मौत हो गई .बाद में इस ह्त्याकाण्ड के लिए बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सज़ा सुनाई गई.

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