जब राजपूत वीरांगना ‘किरण देवी’ से अकबर को मांगनी पड़ी अपने प्राणों की भीख

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राजपूत पुरुष जीतनी अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थे उतनी ही प्रसिद्ध थी राजपूती महिलायें।अपनी आन बान शान के लिए राजपूत वीरांगनाओं ने भारत के इतिहास को गौरवान्वित कर रखा है. जब भी किसी ने उनकी तरफ आँख उठा कर देखने ली कोशिश की इस राज्पूत्नियों ने उनकी आँखें नोचने से भी गुरेज नहीं किया. भले ही सामने आम इंसान हो या फिर शहंशाह .आज हम आप को ऐसी ही एक वीरांगना की कहानी बताने जा रहे हैं .जिनका नाम था किरण देवी जो मेवाड़ के महाराणा प्रतापसिंह के छोटे भाई शक्तिसिंह की पुत्री थी .एक बार बादशाह अकबर की कुदृष्टि उनपर पड़ गई लेकिन किरण देवी’ ने अकबर को अपने प्राणों की भीख मांगने पर मजबूर कर दिया था।

अकबर प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज के मेले का आयोजन करता था, जिसमें वह सुंदर युवतियों को खोजता था, और उनसे अपने शरीर की भूख शांत करता ।एक बार अकबर नौरोज के मेले में बुरका पहनकर सुंदर स्त्रियों की खोज कर ही रहा था, कि उसकी नजर मेले में घूम रही किरणदेवी पर जा पड़ी. अकबर ने बाद में किरणदेवी का पता लगा लिया कि यह तो अपने ही सेवक की बीबी है, तो उसने पृथ्वीराज राठौर को जंग पर भेज दिया और किरण देवी को अपनी दूतियों के द्वारा, बहाने से महल में आने का निमंत्रण दिया।

किरणदेवी जब अकबर के महल में पहुँची तो अकबर ने उनसे कहा कि, ‘‘हम तुम्हें अपनी बेगम बनाना चाहते हैं।’’ कहता हुआ अकबर आगे बढ़ा, तो किरणदेवी पीछे को हटी…अकबर आगे बढ़ते गया और किरणदेवी उल्टे पांव पीछे हटती गयी…लेकिन कब तक हटती बेचारी पीछे को…उसकी कमर दीवार से जा ली।खुद को फंसा हुआ देख किरण देवी ने साहस नहीं खोया. तभी उसकी नजर कालीन पर पड़ी। उसने कालीन का किनारा पकड़कर उसे जोरदार झटका दिया।उसके ऐसा करते ही अकबर जो कालीन पर चल रहा था, पैर उलझने पर वह पीछे को सरपट गिर पड़ गया, ‘‘या अल्लाह!’’ उसके इतना कहते ही किरणदेवी को संभलने का मौका मिल गया और वह उछलकर अकबर की छाती पर जा बैठी और अपनी आंगी से कटार निकालकर उसे अकबर की गर्दन पर रखकर बोली, अब बोलो शहंशाह, तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है? किसी स्त्री से अपनी हवश मिटाने की या कुछ ओर?’’

एकांत महल में गर्दन से सटी कटार को और क्रोध में दहाडती किरणदेवी को देखकर अकबर भयभीत हो गया। मौत सामने देख अकबर किरण देवी के सामने गिडगिडाने लगा. गिडगिडाते हुए अकबर बोला मैं कुरान-ए-पाक की कसम खाकर कहता हूँ कि आज ही नौरोज मेला बंद कराने का फरमान जारी कर दूँगा।”

वीर पतिव्रता किरणदेवी ने दया करके अकबर को छोड़ दिया और तुरन्त अपने महल में लौट आयी। इस प्रकार एक पतिव्रता और साहसी महिला ने प्राणों की बाजी लगाकर न केवल अपनी इज्जत की रक्षा की, अपित भविष्य में नारियों को उसकी वासना का शिकार बनने से भी बचा लिया। और उसके बाद वास्तव में नौरोज मेला बंद हो गया। अकबर जैसे सम्राट को भी मेला बंद कर देने के लिए विवश कर देने वाली इस वीरांगना का साहस प्रशंसनीय है।

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