ये है धरती पर नर्क का द्वार ,50 साल से धधक रहे हैं शोले

2013 में नेशनल जियोग्राफिक के एक शोधार्थी जॉर्ज कोरोउनिस ने नरक के इस द्वार में प्रवेश किया था, उन्होंने पाया कि चट्टानों, कंदराओं, पर्वतों, नदियों और समंदरों के किनारे पाया जाने वाला माइक्रोबाइल जीवन गर्म मीथेन गैस वाले वातावरण में भी सांस ले रहा था।

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1971 में यानी आज से तकरीबन 47 वर्ष पहले सोवियत वैज्ञिनिकों की एक टीम तुर्कमेनिस्तान के काराकुम रेगिस्तान पहुंची और प्राकृतिक गैस की भरपूर संभावनाओं वाले इस इलाके में खुदाई चालू कर दी। रेगिस्तान को भेदते हुए वे एक गुफा बनाते जा रहे थे कि तभी जमीन का बड़ा हिस्सा भरभराकर धंस गया और जिसने करीब 70 मीटर चौड़े गड्ढे की शक्ल अख्तियार कर ली। गड्ढे से गैस बह चली। जहरीली गैस कहीं आसपास के इलाके में मौत का सबब न बन जाए इसलिए वैज्ञानिकों ने उसमें आग लगा दी। वैज्ञिनिकों को लगा था कि प्राकृतिक ईधन खत्म होते ही आग शांत हो जाएगी लेकिन उसकी लपटें आज तक धधक रही हैं। रेगिस्तान के सीने पर वर्षों से धधकती आग नयनाभिराम दृश्य बनाती है जिसे करीब से अनुभव करने के लिए दूर-दराज से पर्यटक भी पहुंचते हैं। इसके पास 400-500 की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है, देरवेजे। देरवेजे और आसपास के लोग आग के इस विशालकाय गड्ढे को नरक का द्वार या पाताल का द्वार बुलाते हैं।

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