एक तवायफ के कारण नादिरशाह ने दिल्ली में क़त्ल-ए-आम मचा दिया

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नादिर शाह 1739 में हिंदुस्तान जाने के मशहूर रास्ते ख़ैबर दर्रे को पार करके हिंदुस्तान में दाख़िल हो गया. जब नादिर शाह दिल्ली से सौ मील दूर पहुंच गया तो मुग़ल शहंशाह मुहम्मद शाह रंगीला को ज़िंदगी में पहली बार अपनी फौजों का नेतृत्व स्वंय करना पड़ा. यहां भी हालात ऐसे की उनके लश्कर की कुल तादाद लाखों में थी, जिसका बड़ा हिस्सा बावर्चियों, संगीतकारों, कुलियों, सेवकों, खजांचियों और दूसरे नागरिक कर्मचारियों का था जबकि लड़ाका फौज एक लाख से कुछ ही ऊपर थी.उसके मुक़ाबले पर ईरानी फौज सिर्फ़ 55 हज़ार की थी.

अय्याश मुहम्मद शाह रंगीला ने नादिर शाह को सौंप दिया कोहिनूर

लेकिन कहां जंगों में पले नादिर शाही लड़ाका दस्ते और कहां हंसी खेल में धुत मुग़ल सिपाही. करनाल के मैदान में सिर्फ़ तीन घंटों में फैसला हो गया और नादिर शाह मोहम्मद शाह को क़ैदी बनाकर दिल्ली के विजेता की हैसियत से शहर में दाख़िल हो गया .

अभी चंद ही दिन गुज़रे थे कि शहर में अफ़वाह फैल गई कि एक तवायफ़ ने नादिर शाह को क़त्ल कर दिया है.दिल्ली के लोगों ने इससे सह पाकर शहर में तैनात ईरानी सैनिकों क़त्ल करना शुरू कर दिया.नादिर शाह ने दिल्ली वालों की इस हिमाकत का बदला लेने का फैसला किया. “सूरज की किरण अभी अभी पूर्वी आसमान फूटी ही थीं कि नादिर शाह दुर्रानी अपने घोड़े पर सवार लाल क़िले से निकल आया. उसका बदन ज़र्रा-बक़्तर से ढका हुआ, सर पर लोहे का कवच और कमर पर तलवार बंधी हुई थी और कमांडर और जरनैल उनके साथ थे. उसका रुख आधा मील दूर चांदनी चौक में मौजूद रोशनउद्दौला मस्जिद की ओर था. मस्जिद के बुलंद सहन में खड़े हो कर उसने तलवार म्यान से निकाल ली.”ये उसके सिपाहियों के लिए इशारा था.

सुबह के नौ बजे क़त्ल-ए-आम शुरू हुआ. कज़लबाश सिपाहियों ने घर-घर जाकर जो मिला उसे मारना शुरू कर दिया.इतना ख़ून बहा कि नालियों के ऊपर से बहने लगा. लाहौरी दरवाज़ा, फ़ैज़ बाज़ार, काबुली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, हौज़ क़ाज़ी और जौहरी बाज़ार के घने इलाक़े लाशों से पट गए.हज़ारों औरतों का बलात्कार किया गया, सैकड़ों ने कुओं में कूद कूद कर के अपनी जान दे दी. कई लोगों ने ख़ुद अपनी बेटियों और बीवीयों को क़त्ल कर दिया कि वो ईरानी सिपाहियों के हत्थे न चढ़ जाएं.

उस दिन तीस हज़ार दिल्ली वालों को तलवार के घाट उतार दिया गया. आख़िर मोहम्मद शाह ने अपने प्रधानमंत्री को नादिर शाह के पास भेजा. कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नंगे पांव और नंगे सिर नादिर शाह के सामने पेश हुए और ये शेर पढ़ा-और कोई नहीं बचा जिसे तू अपनी तलवार से क़त्ल करे…सिवाए इसके कि मुर्दा को ज़िंदा करे और दोबारा क़त्ल करेइस पर कहीं जाकर नादिर शाह ने तलवार दोबारा म्यान में डाली तब कहीं जाकर उसके सिपाहियों ने हाथ रोका.

क़त्ल-ए-आम बंद हुआ तो लूटमार का बाज़ार खुल गया. शहर के अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया और फौज की ड्यूटी लगा दी गई कि वो वहां से जिस क़दर हो सके माल लूट ले. जिस किसी ने अपनी दौलत छुपाने की कोशिश की उसे बहुत बुरी तरह प्रताड़ित किया गया.जब शहर की सफ़ायी हो गई तो नादिर शाह ने शाही महल की ओर रुख किया.

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