ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह जम्वाल -इस शख्स की वजह से आज कश्मीर भारत का हिस्सा है

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कश्मीर अपने निर्माण काल से ही भारत के लिए एक सरदर्द की तरह है. भारत के इस हिस्से पर पाकिस्तान अपना दावा करता आया है और इस दावेदारी की कीमत पिछले 71 साल में करोड़ों लोगों अपनी जानें गंवा कर चुकानी पड़ी है. वर्तमान में कश्मीर जिस स्थिति में है या जिस दौर से गुज़र रहा है उसके लिए अनेक व्यक्ति जिम्मेवार हैं लेकिन उस व्यक्ति को शायद ही कोई याद करता है जिसके बूते भारत जम्मू कश्मीर को अपना अभिन्न अंग बताता है .ये शख्स थे राजेंद्र सिंह जम्ब्वाल . राजेंद्र सिंह जम्वाल का जन्म 14 जून, 1899 में हुआ और जम्मू के जीजीएम साइंस कालेज से अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद राजेंद्र सिंह से कश्मीर सशस्त्र सेना में भर्ती होने के लिए प्रयास करने लगे और जल्द ही अपनी निष्ठा और लगन के दम पर वे सेना में चुन लिए गए | अपने कठिन परिश्रम और अनुभव के दम पर वे 21 जून, 1921 को कश्मीर सेना के ब्रिगेडियर पद तक पहुँच गए |

कश्मीर को जबरन हथियाने के अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए पाक सेना के कबायली लड़ाकों के साथ मिलकर 22 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर पर हमला कर दिया | महाराजा हरिसिंह को पहले ही इसका अंदेशा हो गया था और उन्होंने अपने मंत्री को भारत से सैन्य सहायता लाने के लिए भेजा, मगर नेहरू जी ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि भारतीय सेना भारत की सीमाओं की रक्षा के लिए है और कश्मीर भारत का अंग नहीं है अगर कश्मीर बिना किसी शर्त के भारत में शामिल होने की घोषणा करता है तो भारत की सेना मदद के लिए भेजी जा सकती है | 22 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर पर हमला करके रावलकोट, चिकोटी और मुजफ्फराबाद सहित कश्मीर का दो तिहाई हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया और पाकिस्तानी फ़ौज श्रीनगर से महज 164 किमी दूर थी ऐसे में कश्मीर के सेनाध्यक्ष राजेंद्र सिंह जम्वाल ने महाराजा हरिसिंह से आग्रह किया कि वे जंग में जाने का विचार त्याग कर वक़्त की नजाकत को समझें और कश्मीर के भारत में विलय को जल्द से जल्द स्वीकार करने का कार्य करें अन्यथा पाक सेना सम्पूर्ण कश्मीर पर कब्ज़ा कर लेगी | जब तक भारत की सेना मदद के लिए नहीं आती तब तक मैं पाक सेना को रोक कर रखूँगा |

जब ब्रिगेडियर जम्वाल को जानकारी मिली कि पाक सेना मुजफ्फराबाद के निकट आ गई है तो मात्र 100 सैनिकों के साथ ब्रिगेडियर जम्वाल ने 6 हज़ार की पाक सेना को कश्मीर से बाहर खदेड़ने निकल पड़े और सबसे पहले उन्होंने बिना समय गंवाए उरी और बारामूला को श्रीनगर से जोड़ने वाले पुल को धमाके से उड़ा दिया जिससे दुश्मन सेना दो दिन तक आगे नहीं बढ़ सकी| 23 से 27 अक्टूबर, 1947 तक जम्वाल और पाकिस्तानी सेना में भयंकर युद्ध हुआ | ब्रिगेडियर जम्वाल ने ‘गोरिल्ला युद्ध पद्धति’ अपनाकर पाकिस्तान की सेना और कबायलियों को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया| उन्होंने उरी नाले के पास अपनी सेना की एक टुकड़ी को तैनात किया और खुद गढ़ी की ओर निकल पड़े .

27 अक्टूबर, 1947 का दिन था जब ब्रिगेडियर जम्वाल ने सैनिकों के साथ मिलकर सेरी के पुल पर मोर्चा संभाला | वहां पर कबायलियों और पाक सेना द्वारा कश्मीरी सैनिकों के वाहनों पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ बरसाई गई जिसमें दुश्मनों से जूझते जूझते ये वीर सपूत सदा सदा के लिए चिरनिद्रा में लीन हो गया और अपने पीछे छोड़ गया अपना स्वर्णिम इतिहास |

ब्रिगेडियर जम्वाल ने अपनी कुशल रणनीति और अदम्य शौर्य से दुश्मनों को आगे नहीं बढ़ने दिया और जब तक जम्वाल वीरगति को प्राप्त हुए भारत की सेना ने आकर मोर्चा संभल लिया और देखते ही देखते पाक सेना और कबायलियों के पैर उखड़ने लगे, बड़ी संख्या में सैनिक मरे गए और शेष भारतीय सेना के भय से पीछे हट गए| ब्रिगेडियर जम्वाल के कारण कश्मीर का यह भाग सदा सदा के लिए भारत का अभिन्न अंग बन गया |

18 अक्टूबर, 1947 को महाराजा हरिसिंह ने भारत के प्रतिनिधि माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के साथ हुए विचार विमर्श के दौरान ही भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय पर अपनी सहमति दे दी थी और अंततः 26 अक्टूबर, 1947 को महाराजा हरिसिंह ने भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय पर सहमति देते हुए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और इसी के साथ ब्रिगेडियर जम्वाल की भारत में कश्मीर के विलय की मंशा भी पूरी ही गई |

30 दिसम्बर, 1949 को राजेंद्र सिंह जम्वाल की पत्नी रामदेई को भारत सरकार की ओर से महावीर चक्र प्रदान कर सम्मानित किया गया | राजेंद्र सिंह जम्वाल पहले व्यक्ति थे जिन्हें इस सम्मान से नवाजा गया| राजेंद्र सिंह जम्वाल अपने शौर्य, अदम्य साहस, कुशल रणनीति, देशभक्ति और अपनी शहादत के साथ ही साथ कश्मीर को भारत में विलय कराने और पाक के नापाक इरादों को धुल में मिलाने वाले अमर नायक थे|

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