महाराणा कुम्भा :दुश्मनों से नहीं अपने धोखेबाज बेटे से हार गया राणा

वाड के राजा महाराणा कुंभा का नाम इतिहास में वीरता और अद्भूत योद्धा के रूप में प्रसिद्द है।

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मेवाड के राजा महाराणा कुंभा का नाम इतिहास में वीरता और अद्भूत योद्धा के रूप में प्रसिद्द है। कुम्भा का आतंक ऐसा था कि आस-पड़ोस के राजा उनसे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे. मेवाड़ के आसपास जो राज्य थे, उन पर उन्होंने अपना आधिपत्य स्थापित किया। 35 वर्ष की अल्पायु में उनके द्वारा बनवाए गए बत्तीस दुर्गों में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ जहां सशक्त स्थापत्य में शीर्षस्थ हैं, उनकी विजयों का गुणगान करता विश्वविख्यात विजय स्तंभ भारत की अमूल्य धरोहर है। कुंभा का इतिहास केवल युद्धों में विजय तक सीमित नहीं थी बल्कि उनकी शक्ति और संगठन क्षमता के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता भी आश्चर्यजनक थी। ‘संगीत राज’ उनकी महान रचना है जिसे साहित्य का कीर्ति स्तंभ माना जाता है। जो राणा कभी भी युद्ध में दुश्मनों से नहीं हारे वो अपने बेटे के हाथों मात खा गए . इन्हें इनके बेटे ने ही धोखे से मौत के घाट उतार दिया था।

महाराणा कुम्भा का जन्म मेवाड के महारणा मोकल के घर में हुआ था। महाराणा मोकल की 1431 में मृत्यु हो गयी। जिसके बाद 1433 में मेवाड की गद्दी महाराणा कुम्भा को मिली। मगद्दी पर बैठने के बाद महाराणा कुम्भा ने अपने दुश्मन देवराज चौहान को हराकर आबु पर कब्जा किया। इसके बाद उन्होनें मालवा की ओर कुच किया और वहां के सुल्तान महमुद खिलजी को हराया।

राणा कुम्भा वीर योद्धा होने के साथ साथ ही एक न्यायप्रिय राजा भी था . मेवाड की जनता भी उन्हें बहुत चाहती थी। उनकी लोकप्रियता दिन ब दिन बढती जा रही थी। लेकिन महाराणा कुम्भा की लोकप्रियता से उनका बडा बेटा उदयसिंह खुश नहीं था जो कि एक राणा कुम्भा के विपरित महत्वकांक्षी और क्रुर व्यक्ति था। वह चाहता था कि जल्द से जल्द उसे मेवाड की गद्दी मिल जाये लेकिन राणा कुम्भा के रहते यह संभव नहीं था। इसलिये उसने अपने पिता को मारने की साजिश रची. उसे पता था कि सुबह कुम्भा भगवान शिव की पूजा करने वह निहत्थे मंदिर जाते है। वह राणा कुम्भा के आने से पहले ही मंदिर में जाकर छिप गया और जब राणा कुम्भा मंदिर भगवान की पूजा कर रहे थे तब उसने पिता के खून से उस मंदिर को लाल कर दिया और खुद मेवाड की गद्दी का मालिक बन बैठा।

उदय सिंह चतुर प्रशासक और कुशल योद्धा नहीं था यही वजह थी कि उसने सत्ता में आने के 5 साल के भीतर ही मेवाड के बडे क्षेत्र को खो दिया। राजपूत सरदारों के विरोध की वजह से उदा सिंह को हटाकर उसके छोटे भाई राजमल को गद्दी पर बिठाया गया जिसने 1473 से 1509 तक शासन किया।

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