महाराजा सूरज मल्ल :जब 330000 की मराठा सेना को 20 हजार जाटों ने हरा दिया

पेशवाओं ने महाराजा सूरजमल की मान ली होती तो तीसरा मैदान-ए-पानीपत हिन्दुस्तानियों के नाम रहता।

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मध्यकालीन भारत में मुख्य रूप से तीन ही शक्तिशाली साम्राज्य थे जो किसी भी विदेशी आक्रमणकारियों से लोहा ले सकते थे .ये थे राजपूत ,मराठा और जाट.लेकिन दिक्कत ये थी कि इन तीनों में हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी रहती थी. इसका फायदा उठाकर विदेशी आक्रमणकारी भारत में घुस आते थे और मनचाही लूट मचा देते थे. शक्ति का ये संतुलन तब बिगड़ा जब राजपूत और जाट एक हो गए जिसका नतीजा ये निकला की मराठा साम्राज्य ख़त्म हो गया .पानीपत की लड़ाई में अहमदशाह अब्दाली और मराठों के बीच जो युद्ध हुआ उसकी हार ने मराठा साम्राज्य की कमर तोड़ दी. आखिर क्या वजह थी की अब्दाली के विरोधी होने के बावजूद मराठों ने जाटों और राजपूतों का समर्थन नहीं लिया .इसके पीछे एक बड़ी दिलचस्प कहानी है

21 सितम्बर 1743 को सवाई राजा जय सिंह की मौत के बाद जयपुर की गद्दी के लिये विवाद शुरू हुआ| राज-परम्परानुसार गद्दी बड़े भाई को मिलती है इसलिए ईश्वरी सिंह गद्दी पर बैठे| पर छोटे भाई माधो सिंह ने उदयपुर के राजा जगत सिंह को साथ लेकर जयपुर पर हमला बोल दिया। लेकिन इस लड़ाई में माधो सिंह की हार हुई और वो भाग गया. राजा ईश्वरी सिंह को गद्दी संभाले हुए अभी एक साल ही हुआ था कि माधो सिंह की गद्दी की लालसा फिर बढ़ने लगी और उसने मराठा- पेशवाओं से मदद मांगी। पेशवा 80000 मराठा फ़ौज लेकर निवाई तक आ पहुँचे और ईश्वरी सिंह को मज़बूरी में बिना लड़े ही 4 परगने माधो सिंह को देने पड़े।

अब माधो सिंह अपने राज्य का विस्तार करने में लग गया और राजा ईश्वरी सिंह के लिए खतरा बनने लगा। ऐसे में राजा ईश्वरी सिंह को जाट राजा सूरजमल की याद आई और उन्होंने उनसे मदद के गुहार लगाईं. सूरज-मल्ल जाट  10000 जाट सैनिकों के साथ मदद के लिए आ पहुंचे. जैसे ही सूरजमल जयपुर पहुंचे, उन्होंने राजा ईश्वरी सिंह के साथ मिलकर मराठा-पेशवा के साथ हुआ समझौता संधि-पत्र फाड़ कर फिंकवा दिया।

इस हिमाकत की सुन मराठा पेशवाओं का लहू खौल उठा और मल्हार राव होल्कर की अगुवाई में 80000 धुरंधर मराठा सैनिकों को भेज दिया। मराठों के नेतृत्व में अब कुल मिलाकर 330000 की सेना हुंकार भर रही थी और दूसरी तरफ थे मात्र 20,000 जाट और कुशवाहा राजपूत, जिनकी कि सैन्य बल को देखते हुए हार निश्चित थी|

सूरजमल जाट ने जयपुर की फ़ौज की कमान संभाली और जाट सैनिकों को साथ लेकर मराठों पर आत्मघाती हमला बोला। मराठों ने इतने लंबे तगड़े आदमी पहले कभी नहीं देखे थे। सूरजमल ने 50 घाव खाये और 160 मराठों को अकेले ही मार दिया। इस हमले ने मराठों की कमर तोड़ कर रख दी। जाटों ने ईश्वरी सिंह की निश्चित हार को जीत में बदल दिया।  

यह मुख्यत: इसी लड़ाई की हार का दंश था कि पानीपत की तीसरी लड़ाई के वक्त मराठा-पेशवाओं ने तब तक कुंवर से महाराज बन चुके महाराजा सूरजमल की एक सलाह ना सुनी और जाटों के प्लूटो और समस्त एशिया के ओडीसियस सूरज सुजान को संदेशे का इंतज़ार करते छोड़, घमंड और दम्भ में भरे पेशवा बिना जाटों के मैदान-ए-पानीपत जा चढ़े और अब्दाली के हाथों मुंह की खाई। और तब से हरयाणे में कहावत चली कि, ‘बिन जाटां किसनें पानीपत जीते!’अगर  ब्राह्मण-पेशवाओं ने महाराजा सूरजमल की मान ली होती तो तीसरा मैदान-ए-पानीपत हिन्दुस्तानियों के नाम रहता।

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