भिश्ती निजाम:एक दिन का बादशाह ऐसे भारतीय इतिहास में अमर हो गया

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26 जून 1539 को चौसा के मैदान में मुगल बादशाह हुमायूं व अफगान शासक शेरशाह के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में हुमायूं की करारी हार हुई। शेरशाह द्वारा रात में किये गये अचानक आक्रमण ने हुमायूं को संभलने का भी मौका नहीं दिया। इससे हुमायूं के ज्यादातर सैनिक गंगा नदी में डूब गये और जो बचे वो अफगान सैनिकों के शिकार हो गये। ऐसे में हुमायूं के पास अपनी जान बचाने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था। चारों तरफ से अफगान सैनिकों से घिरे हुमायूं अपनी जान बचाने के लिए उफनती गंगा में कूद गया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि हुमायूं को तैरना नहीं आता था। इसलिए वह उफनती गंगा में डूबने लगा। तब चौसा के भिश्ती निजाम ने हुमायूं की जान बचाकर गंगा के उस पार उतार दिया था।

कन्नौज के युद्ध में हुई हार के बाद हुमायूं को दर-दर के लिए भटकना पड़ा। लेकिन, हुमायूं ने हिम्मत नहीं हारी। फिर से सैनिकों को इकट्ठा किया तथा दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली। दूसरी बार बादशाह बनने के बाद हुमायूं ने उस जान बचाने वाले भिश्ती को ढूंढ निकाला और उसे एक दिन के लिए उसे दिल्ली का बादशाह बना दिया। हुमायूं द्वारा मिली एक दिन की बादशाहत में निजाम चमड़ा का सिक्का चलाकर सदा के लिए अमर हो गया।

चौसा के भिश्ती निजाम को एक दिन के लिए दिल्ली की बादशाहत क्या मिली, उसने चमड़ा का सिक्का चलाकर सदा के लिए भारतीय इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया। भारत के मध्यकालीन इतिहास में चमड़ा का सिक्का चलाने वाले बादशाह के नाम से निजाम विख्यात है। निजाम के द्वारा चलाया गया चमड़ा का सिक्का आज भी पटना संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।

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