रॉबर्ट क्लाइब : कैसे इस्ट इंडिया कंपनी के एक मामूली क्लर्क ने भारत को अंग्रेजों का गुलाम बनाया

क्लाइब. ने ना केवल मुग़ल सल्तनत को घुटनों पर ला खडा किया बल्कि हिन्दुस्तान का अरबों रुपया लूट कर इंग्लैण्ड पहुंचा दिया

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Robert Clive was a British soldier who established the military and political supremacy of the East India Company in Southern India and Bengal. He is credited with securing India, and the wealth that followed, for the British crown. Clive had led an army from Madras and in 1758 defeated Sirajudaula at the Battle of Plassey and became the governor of Bengal under the banner of the East India Company. From there he was able to launch successful military campaigns against the French and stop the expansion of the Dutch.

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ें जमाने और भारत को अंग्रेजों का गुलाम बनाने में एक शख्स का सबसे बड़ा हाथ था और वो थे लॉर्ड क्लाइब.इस अंग्रेज जनरल ने ना केवल मुग़ल सल्तनत को घुटनों पर ला खडा किया बल्कि हिन्दुस्तान का अरबों रुपया लूट कर इंग्लैण्ड पहुंचा दिया .क्लाइब को भारत के करोड़ों लोगों की मौत का जिम्मेदार भी माना जाता है. आइये आपको बताते हैं कि इस अंग्रेज जनरल का आखिर हुआ क्या?

अंग्रेजों के भारत में फैलाव के इस सफ़र में सबसे अहम मोड़ 1757 में लड़ी जाने वाली प्लासी की जंग है ,, जिसमें राबर्ट क्लाईव के तीन हज़ार सिपाहियों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की 50 हज़ार फौज को शिकस्त दे दी. जंग के बाद क्लाईव ने सिराद्दौला का सदियों से जमा किया हुआ ख़ज़ाना समुद्री जहाज़ों से लदवा कर लंदन पहुंचा दिया .लेकिन क्लाईव ने तमाम दौलत शाही ख़ज़ाने में जमा नहीं करवाई बल्कि अपने लिए भी कुछ हिस्सा रख लिया, जिसकी क़ीमत आज कल के हिसाब से तीन करोड़ डॉलर बनती है. इस पैसे से ब्रिटेन में एक शानदार महल बनवाया और व्यापक ज़मीनें खरीदी जिसका नाम ‘पलासी’ रखा. यही नहीं, उसने पैसा देकर न सिर्फ़ अपने लिए बल्कि अपने बाप के लिए भी संसद की सीट खरीद ली. बाद में इसे ‘सर’ का ख़िताब भी अता कर दिया गया.

इसी दौरान बंगाल में आने वाले ख़ौफ़नाक अकाल और उसके नतीजे में सूबे की एक तिहाई आबादी के ख़त्म हो जाने की ख़बरें इंग्लिस्तान पहुंचना शुरू हो गई थीं जिनका कारण लॉर्ड क्लाईव की पॉलिसियों को क़रार दिया गया.लाट साहब पर उंगलियां उठने लगीं, करते करते नौबत संसद में अनुबंध पेश होने तक जा पहुंची. ये अनुबंध तो खैर मंज़ूर नहीं हो सका, क्योंकि उस ज़माने में संसद के एक चौथाई के लगभग सदस्यों का खुद ईस्ट इंडिया कम्पनी में हिस्सा थे.बहस के दौरान क्लाईव ने समझदारी से काम लेते हुए अपनी दौलत के बारे में कहा कि, ‘मैं तो खुद सख्त हैरान हूं कि मैंने हाथ इस क़दर ‘हौला’ क्यों रखा!’ वर्ना वो चाहते तो इससे कहीं अधिक माल व सोना समेट कर ला सकते थे.

हालांकि भारत में बरपा होने वाली क़यामत के प्रभाव किसी न किसी हद तक क्लाईव के दिल व दिमाग़ पर असरअंदाज़ होने लगे और उसने बड़ी मात्रा में अफ़ीम खाना शुरू कर दिया. नतीजा ये निकला कि वो 1774 में अपने कमरे में रहस्यमय हालत में मुर्दा पाया गया.

ये पहेली आज तक हल नहीं हो सका कि क्लाईव ने आत्महत्या की थी या अफ़ीम की अधिक खुराक जानलेवा साबित हुई. लेकिन ये बात बिल्कुल स्पष्ट है कि उसकी भारत में रणनीतियों के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी जिस रास्ते पर चल पड़ी वो भारत की आज़ादी के लिए ज़रूर जानलेवा साबित हुई.

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