महादजी सिंधिया-गन्ना बेगम:जब इस मराठा सरदार की मुहब्बत में मुग़ल बेगम ने दे दी जान

गन्ना कब्र पर महादजी ने फारसी में लिखवाया, 'आह गम-ए-गन्ना बेग़म', इसका मतलब है, गन्ना बेगम के गम में निकली आह।

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 गन्ना बेगम मुग़ल शहजादा शुजा के हरम की सबसे ख़ास कनीज थी .शुजा उसे बिलकुल बेगम की तरह मान देता था .गन्ना महादजी की वीरता और उदारता से प्रभावित हो कर उनसे प्रेम करने लगी थी। महादजी के दुश्मनों की टोह लेने गई गन्ना शुजा के  हाथ पड़ गई। इज्जत बचाने के लिए गन्ना ने जहर खा कर जान दे दी। 

पहले गन्ना को धौलपुर के राजकुमार जवाहर सिंह से प्यार हो गया और शादी करने भी खुद भाग कर पहुंच गई।लेकिन जवाहर सिंह के पिता राजा सूरजमल उनके प्यार के दुश्मन बन गए। गन्ना को बहू बनाने को लेकर बाप-बेटे में जंग हुई, जवाहर सिंह एक टांग गंवा बैठा और हारा और बंदी बना लिया गया।बाद में उसने राजपाट और दौलत के लिए बड़े बाई नाहर सिंह की विधवा से शादी कर गन्ना को भुला दिया। जवाहर सिंह की बेवफाई से गन्ना उसी शुजाउद्दौला के कब्जे में आ गई जिसके चंगुल से वह भाग कर आई थी। गन्ना को शुजाउद्दौला के हरम में गुलाम बन कर रहना गवारा नहीं था, लिहाजा एक बार फिर गन्ना भाग निकली।

महादजी सिंधिया की वीरता के किस्से सुनती आई गन्ना ने सिख का वेश बनाया और महादजी की सेना में भर्ती हो गई। हिंदी, अरबी और फारसी में उसकी काबिलियत देख महादजी ने उसे अपना पत्र-लेखक बना लिया और उसका नाम गुनी राम रख दिया। कामकाज के सिलसिले में महादजी के साथ के एकांतवास में धीरे-धीरे गुनी राम के गन्ना बेगम होने की हकीकत महादजी के सामने उजागर हो गई। अब महादजी एकांत में खूबसूरत गन्ना के गायन और नृत्य का भी आनंद लेने लगे थे, लेकिन बाहर वालों के लाए वह अभी भी गुनी राम ही थी।

देशी हिंदू राजाओं के खिलाफ मुस्लिम शासकों को भड़काते फकीरों के साथ एक दिन मुग़ल शहजादा शुजा ग्वालियर रियासत के नूराबाद तक आ पहुंचा। गन्ना को सिंधिया रियासत के खुफिया तंत्र से इसकी सूचना मिली, तो वह बुरका पहन कर उनके षड्यंत्रों का जायजा लेने गई। धूर्त शुजा ने चालढाल से ही अपने हरम में रही गन्ना को पहचान लिया, और उसे अपनी हवस का शिकार बनाने की योजना बनाने लगा। गन्ना ने शुजा के षडयंत्र को पहचान लिया उसके चंगुल में पड़ने से पहले ही ज़हर खा कर जान दे दी। गन्ना की सुरक्षा में गए खुफिया सैनिकों ने जब महादजी को गन्ना के शुजा हाथ पड़ने की सूचना दी तो वो अपनी टुकड़ी के साथ रवाना हुए, लेकिन तब तक गन्ना दम तोड़ चुकी थी।

महादजी के आने की खबर सुन शुजा और उसके साथी वहां से भाग गए। बाद में महादजी ने गन्ना को सांक नदी के किनारे ही दफना कर उसकी कब्र बनवा दी। गन्ना कब्र पर महादजी ने फारसी में लिखवाया, ‘आह गम-ए-गन्ना बेग़म’, इसका मतलब है, गन्ना बेगम के गम में निकली आह।

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