जब राजा कृष्णदेव राय ने बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह से अपने जूते चटवाए

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विजय नगर के महाराजा कृष्णदेव राय एक अद्भुत योद्धा और सह्रदय राजा थे. विभिन्न युद्धों में लगातार विजय के कारण अपने जीवन काल में ही राजा कृष्णदेव राय लोक कथाओं के नायक हो गए थे। उन्हें अवतार कहा जाने लगा था और उनके पराक्रम की कहानियाँ प्रचलित हो गयी थीं। रायचूर विजय ने सचमुच उन्हें विश्व का महानतम सेनानायक बना दिया था। सबसे कठिन और भारतवर्ष का सबसे विशाल युद्ध रायचूर के क़िले के लिए हुआ था। कृष्णदेव राय रायचूर का समृद्ध क़िला जीतकर विजयनगर साम्राज्य में मिलाना चाहते थे . यह अवसर भी अनायास ही कृष्णदेव राय के हाथ आया।

घटनाक्रम के अनुसार कृष्णदेव राय ने एक मुस्लिम दरबारी सीडे मरीकर को 50,000 सिक्के देकर घोड़े ख़रीदने के लिए गोवा भेजा था। किंतु वह अली आदिलशाह प्रथम के यहाँ भाग गया। कृष्णदेव राय ने जब बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह से उसे वापस भेजने को कहा तो उन्होंने अस्वीकार कर दिया। तब कृष्णदेव राय ने युद्ध की घोषणा कर दी और बीदर, बरार, गोलकुण्डा के सुल्तानों को भी सूचना भेज दी। सभी सुल्तानों ने राजा का समर्थन किया। राजा कृष्णदेव राय के नेतृत्व में 6000 घुड़सवार, 4000 पैदल और 300 हाथी अलग थे। यह सेना कृष्णा नदी तक पहुंच गयी थी। 19 मई, 1520 को युद्ध प्रारंभ हुआ और आदिलशाही फ़ौज को पराजय की सामना करना पड़ा। लेकिन उसने तोपखाना आगे किया और विजयनगर की सेना को पीछे हटना पड़ा।

अली आदिलशाह प्रथम को शराब पीने की आदत थी। एक रात्रि वह पीकर नाच देख रहा था, तभी वह अचानक उठा, नशे के जोश में हाथी मंगाया और नदी पार कर विजयनगर की सेना पर हमला करने चल दिया। उसका सिपहसालार सलाबत ख़ाँ भी दूसरे हाथी पर कुछ अन्य हाथियों को लेकर चला। राजा कृष्णदेव राय के सजग सैनिकों ने हमले का करारा जवाब दिया और नशा काफूर होते ही आदिलशाह भागा। प्रात:काल होने तक उसके सिपाही और हाथी कृष्णा नदी में डूब गए या बह गए। ऐसी रणनीति ने उसके सिपाहियों और सेनापतियों का यकीन डिगा दिया। दूसरी ओर कृष्णदेव राय तब तक रणभूमि नहीं छोड़ते थे, जब तक आखिरी घायल सैनिक की चिकित्सा न हो जाए। अत: जब तोपखाने के सामने उनकी सेना पीछे हट गयी तो राजा ने केसरिया बाना धारण कर लिया।

अपनी मुद्रा सेवकों को दे दीं ताकि रानियाँ सती हो सकें और स्वयं घोड़े पर सवार होकर नई व्यूह रचना बनाकर ऐसा आक्रमण किया कि सुल्तानी सेना घबरा गयी और पराजित होकर तितर-बितर हो गयी। सुल्तान आदिलशाह भाग गया और रायचूर क़िले पर विजयनगर साम्राज्य का अधिकार हो गया। आस-पास के अन्य सुल्तानों ने राजा की इस विजय का भयभीत होकर अभिनन्दन किया। जब आदिलशाह का दूत क्षमा याचना के लिए आया तो राजा का उत्तर था कि- “स्वयं आदिलशाह आकर उसके पैर चूमे।कृष्णदेव राय के भय से आदिलशाह स्वयं दरबार में उपस्थित हुआ और राय के पैर चाटने लगा .इस जलालत के बावजूद कृष्णदेव राय ने उन्हें माफ़ नहीं किया बल्कि रायचूर किले पर अपनी सत्ता की सहमती से लेकर उसे छोड़ दिया.

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