नवाब वाजिद अली शाह (पार्ट-2) 300 बेगमों के लिए बनवाया एक शानदार परीखाना

नवाब का बड़ा समय अपनी 300 'परियों' को संतुष्ट करने में गुज़रता था.

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वाजिद अली शाह की जिंदगी के तीन पहलू हैं. उनका नवाब होना, उनका संगीत प्रेम और उनकी मोहब्बतों की दास्तान. आज लखनऊ में जिस इमारत में भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय है. वाजिद अली शाह के समय उसे परीखाना कहते थे. इस इमारत में शाह की परियां रहती थीं. परी मतलब वो बांदियां जो नवाब को पसंद आ जाती थीं. इनमें से अगर कोई बांदी नवाब के बच्चे की मां बनती तो उसे महल कहा जाता. बेग़म हज़रत महल ने बांदी से बेगम होने का सफर महल के रास्ते ही तय किया था.वाजिद अली शाह की गैर मौजूदगी में बेगम हज़रत महल मौलवी अहमद शाह और तमाम ‘नाचने-गानेवालों’ ने फिरंगी फौजों को शहर में घुसने नहीं दिया. आखिरी मोर्चा टूटने के बाद अंग्रेज़ों ने सबसे वीभत्स कत्लेआम भी लखनऊ में किया. सिकंदरबाग़ के बाहर सजाए गए कंकालों की तस्वीरें आज भी इसकी गवाह है.

वाजिद अली शाह को औरत और मर्द के रिश्ते का पहला अहसास 8 साल की उम्र में रहीमन नाम की अधेड़ औरत ने करवाया. ये बात खुद नवाब ने अपनी किताब ‘इश्कनामा’ में लिखी है.नवाब ने लगभग 300 शादियां कीं और तलाक़ भी खूब दिए. इनमें से कुछ निकाह थे. कुछ (112 से ज्यादा) मुताह थे. मुताह कुछ समय के लिए की जाने वाली शादी होती थी. हालांकि निकाह कब तक चलेगा और मुताह कब तक चलेगा इसकी कोई तय सीमा नहीं थी. शाह की सबसे प्रिय बेग़म एक हिंदू, सरफराज़ महल थीं, 10 साल की शादी के बाद सरफराज़ ने इस्लाम कबूल कर लिया. इसके कुछ ही समय बाद नवाब से उनका तलाक हो गया. दूसरी तरफ नवाब की पहली मुताह वाली बीवी माशूक महल से उनका संबंध 30 साल चला. तलाक की सबसे बड़ी वजह बेगमों और उनके बच्चों के बढ़ते खर्चे और समय न देने के चलते होने वाले झगड़े होते थे.

नवाब के बारे में एक खास बात है. दुनिया जब गोरे रंग की दीवानी थी, वाजिद अली शाह गहरे रंग की चमड़ी के कद्रदान थे. उन्होंने अरब व्यापारियों की अफ्रीकी गुलाम औरतों से भी निकाह किए, इनमें से कुछ उनकी बॉडीगार्ड की तरह रहती थीं. इन्हीं में से एक बेगम का नाम अजायब खातून रखा गया.इसमें कोई दो राय नहीं कि वाजिद अली शाह की पसंदीदा औरतों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है. इसमें समय-समय पर बदलाव भी होते रहे. मगर नवाब ने अपनी ‘परियों’ के लिए कई इंतज़ामात भी किए. नवाब का बड़ा समय अपनी 300 ‘परियों’ को संतुष्ट करने में गुज़रता था. ऐसे में कई मसालों वाले कबाब, कुश्ते और तमाम चीज़ों के ज़रिए उन्हें ‘ताकत’ मिलती थी. कहते हैं असली गलावटी कबाब में 160 मसाले पड़ते थे..

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