जब फाइनेंस मिनिस्टर ना बनाए जाने से नाराज सुब्रमण्यम स्वामी ने बाजपेयी सरकार गिरा दी | Mix Pitara

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भारत की राजनीति में सुब्रमण्यम स्वामी की छवि ऐसी है कि विरोधी तो विरोधी उनके समर्थकों में भी उनका डर हमेशा बना रहता है कि पता नहीं कब स्वामी क्या कर बैठें . सुब्रमण्यम स्वामी आज कल भारतीय जनता पार्टी के चहेते बने हुए हैं और मोदी सरकार के पक्ष में खूब बयान जारी करते रहते हैं. लेकिन यही स्वामी हैं जिन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी की 13 दिनों की सरकार को अपनी धुर विरोधी जयललिता से मिलकर मात्र एक वोट से गिरवा दिया था.

जयललिता उस समय राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाने में सफल रहीं, जब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ एक कप चाय पीकर 13 महीने की वाजपेयी सरकार को गिरा दी थी.सोनिया और जयललिता के इस खेल में कभी कांग्रेस के करीबी रहे सुब्रमण्यम स्वामी की अहम भूमिका रही थी. 1998 में स्वामी ही अन्नाद्रमुक (एआईडीएमके) को बीजेपी के करीब लाए थे और अटल बिहारी वाजपेयी केंद्र में सरकार बनाने में सफल रहे थे.

कहा जाता है कि वाजपेयी ने स्वामी को वित्त मंत्रालय देने का वादा किया था जिस वजह से उन्होंने जयललिता और बीजेपी के बीच समझौता करवाया था. प्रधानमंत्री बनने के बाद वाजपेयी अपने वादे से मुकर गए और स्वामी को वित्त मंत्रालय देने से इनकार कर दिया.इमरजेंसी जैसे हालात में इंदिरा गांधी को चुनौती देने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने वाजपेयी से बदला लेने की ठान ली. 1999 तक बीजेपी के धुर विरोधी, यूं कहें तो दुश्मन बन चुके स्वामी ने दिल्ली के अशोक होटल में एक चाय पार्टी का आयोजन किया था.चाय पार्टी में जयललिता और सोनिया की मुलाकात ने देश की राजनीति में एक नया अध्याय लिख दिया. इस मुलाकात में वाजपेयी सरकार को गिराने की नींव रखी गई थी. अन्नाद्रमुक के समर्थन वापस लेते ही महज 13 महीने पुरानी केंद्र सरकार अल्पमत में आ गई और गिर गई.

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