जब हिन्दुओं के साथ मुस्लिम महिलाओं को भी करना पड़ा जौहर

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बादशाह अकबर की आँखों में मालवा का समृद्ध राज्य कई सालों से खटक रहा था. वहां की रानी दुर्गावती अकबर की अधीनता स्वीकार करने को राजी नहीं थी और अकबर इसे बर्दाश्त करने को तैयार नहीं था कि एक हिन्दू महिला शासक उनकी हुक्मउदूली करे. मालवा पर आक्रमण के लिए अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसिफ खां और बाज़ बहादुर के नेतृत्व में सेना भेज दीं। जबलपुर के पास नरई नाले के पास हुए युद्ध में 3000 हजार मुगल सैनिक मारे गए थे। युद्ध में में रानी द्वारा बाज बहादुर को हराने की चर्चा दूसरे राज्यों में होने लगी। यह जब अकबर के कानों तक पहुंची तो वह चकित रह गया। पहले उसने अपने दूत के माध्यम से रानी से मित्रता करनी चाही, रानी ने उसका संदेश स्वीकार कर लिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद उसने छल से रानी के राज्य पर आधिपत्य जमाने का संदेश भेज दिया ये रानी को मंजूर नहीं था।

अकबर की सल्तनत के अधीन मालवा के शासक बाज बहादुर और कड़ा मानिकपुर का सूबेदार आसिफ खां ने अकबर के कहने पर 10 हजार घुड़सवार, सशस्त्र सेना और तोपखाने के साथ आक्रमण किया। रानी दुर्गावती ने 2000 सैनिकों के साथ उसका सामना किया।आसिफ खां ने पहले भी रानी के राज्य पर हमला कर चुका था। हर बार वह बुरी तरह हारा। इसके बाद उसने दोगुनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। ज्यादा घायल होने पर रानी ने अंत समय निकट देख अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंक कर आत्म बलिदान दे दिया .

आसिफ खां रानी की मृत्यु से बौखला गया था। वह उन्हें अकबर के दरबार में पेश करना चाहता था, उसने राजधानी चौरागढ़ पर आक्रमण किया। रानी के पुत्र राजा वीरनारायण ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की। इसके साथ ही चौरागढ़ में जौहर हुआ। जिसमें हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी अपने आप को जौहर के अग्नि कुंड में छलांग लगा दी थी।

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