राजा अजीत सिंह : सारी दौलत दान कर बन गया फ़कीर

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पौराणिक कथाओं में कई काल्पनिक दानवीर राजाओं की ऐसी कहानियाँ आती हैं, लेकिन राजा अजित सिंह कोई पौराणिक कथा के पात्र नहीं हैं. आज से 150 साल पहले दिल्ली शहर — जिसे तब शाहजहाँनाबाद कहा जाता था — में उनकी दरियादिली के क़िस्से मशहूर थे.

पटियाला की जागीर से जब उनके पास लाख डेढ़ लाख रुपए (आज के करोड़ों रुपए) आ जाते थे तो वो अपने घर के सब झाड़ फ़ानूस और क़ालीन बदलवा डालते थे, कई दर्ज़ी उनके घर पर बैठकर सोने-चाँदी के काम वाली पोशाकें और शाल बनाते थे जिन्हें राजा अजित सिंह अच्छे शेर कहने वाले शायरों को तोहफ़े में दे दिया करते थे.
जब ये रक़म ख़त्म हो जाती तो वो अपना काम चलाने के लिए क़र्ज़ लेना शुरू कर देते थे. दो तीन साल में जब क़र्ज़ की रक़म भी तीन-चार लाख तक चढ़ जाती तो लोग तगादा करने लगते थे, गली-कूचों में बदनामी शुरू हो जाती.और ये बदनामी जब पटियाला के महाराजा तक पहुँचती तो वो अपने भतीजे के लिए फिर से ढेर सारी रक़म, सोना चाँदी, हाथी और घोड़े आदि भिजवा देते थे.

जिस ज़माने में सौ रुपए की भारी क़ीमत होती थी, राजा अजित सिंह एक ही बैठक में बीस-बीस हज़ार रुपए तक लुटा दिया करते थे.राजा अजित सिंह भी बर्बादी की कगार पर बैठे दिल्ली शहर के ऐसे ही अमीरों में थे. वो पटियाला के महाराजा के भतीजे थे मगर उन्हें दिल्ली इतनी रास आ गई कि वो यहीं आकर रहने लगे.किसी महफ़िल में अगर शायरों और कलाकारों को तोहफ़े दिए जा रहे हों, वहाँ वो (राजा अजित सिंह) अपना सब कुछ लुटा देते थे और कुछ ही दिनों में फिर से भिखारी बन जाते थे. वो अपने पास हमेशा एक कंबल और दरी रखते थे और कहते थे मैं तो फ़क़ीर हूँ.”

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