टीपू सुल्तान की सल्तनत का नासूर क्यों बन गया उनका ख़ास दरबारी मीर सादिक !

0
175

मैसूर के शासक टीपू सुलतान को लेकर आज जो माहौल बनाया जा रहा है और जैसी उनकी छवि गढ़ी जा रही है उसे लेकर  इतिहासकारों में मतभेद हैं. कुछ लोग टीपू को हिन्दू विरोधी मानते हैं तो कुछ लोग उन्हें महान देशभक्त .लेकिन इतिहासिक घटनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में देखें तो टीपू ने भारत को अंग्रेजों का गुलाम होने से बचाने का भरसक प्रयास किया लेकिन अपने गद्दार दरबारी मीर सादिक की वजह से नाकमयाब रहे और देश रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया .

टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली मैसूर के शासक थे. उन्हें विरासत में ही वीरता मिली थी. इतिहासकार लिखते हैं कि बहुत कम उम्र में ही टीपू ने निशाना साधना, तलवारबाजी और घुड़सवारी सीख ली थी. यही वजह थी कि वे अपने पिता के साथ भी जंग के मैदान में शरीक हुए. टीपू ने 18 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ पहली जंग लड़ी और इसमें जीत दर्ज की. टीपू की वीरता ही थी कि अंग्रेजों को संधि करने के लिए बाध्य होना पड़ा

मैसूर को हथियाने के लिए अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के साथ कई लड़ाइयां लड़ी थीं. दो लड़ाइयों में तो अंग्रेज टीपू सुल्तान को मात नहीं दे सके थे. लेकिन तीसरी लड़ाई ‘मैसूर के शेर’ टीपू सुल्तान के लिए आखिरी लड़ाई साबित हुई थी. इतिहासकार लिखते हैं कि यह लड़ाई न सिर्फ टीपू के लिए, बल्कि भारत के लिए भी महत्वपूर्ण थी. क्योंकि इस लड़ाई को लड़ने से पहले टीपू ने संभवतः पहली बार अंग्रेजों को देश से भगाने की रणनीति बनाई थी. उन्होंने इसके लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी शत्रुओं को मिलाने की योजना बनाई. उन्होंने फ्रांस, अफगानिस्तान हर किसी के साथ अंग्रेजों के खिलाफ संधि करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए. इसके अलावा निजाम और मराठा की अंग्रेजों से मित्रता ने उन्हें शत्रु के मुकाबले कमजोर कर दिया. मीर सादिक़ टीपू सुल्तान का ख़ास मंत्री था और 1799 के प्रसिद्ध युद्ध में अंग्रेजों का सहयोगी बन गया था.उसने टीपू के किले की सारी जानकारी अंग्रेजों तक पहुंचा दी. 

 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम में जब अंग्रेजों से उनका सामना हुआ तो टीपू अपने किले से बाहर थे .जैसे ही वो किले की तरफ बढे मीर सादिक ने अपने साथियों की मदद से किले का दरवाजा बंद कर दिया जिसकी वजह से टीपू को किले के अन्दर से मदद नहीं मिल पाई और इस युद्ध में उनकी मौत हो गयी. इस तरह टीपू सुलतान अंग्रेजों के हाथों नहीं अपनों के ही हाथों शहीद हो गए .

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here