भारत के पहले चक्रवर्ती सम्राट थे विक्रमादित्य,अरब,यूरोप,रोम तक फैला था साम्राज्य

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 महान राजा विक्रमादित्य जिनका नाम भारतवर्ष के श्रेष्ठतम राजाओं में गिना जाता है और उन्हीं के नाम पर आज तक भारत की वर्ष गणना प्रणाली चलती है जिसे हम विक्रमी संवत कहते हैं।दरअसल भारत में राजाओं द्वारा चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि विक्रमादित्य ने ही शुरू की थी . विक्रमादित्य का साम्राज्य वर्तमान भारत से लेकर अफ्रिका और रोम तक फैला हुआ था .विक्रमादित्य पहले राजा थे जिन्होंने वर्तमान के पूरे अरब जगत पर विजय पताका फहराई थी। राजा विक्रमादित्य इस युग के उन गिने चुने महान राजाओं में से आते हैं जो अश्वमेध यज्ञ कर चक्रवर्ती सम्राट बने थे। चक्रवर्ती सम्राट का अर्थ होता है ऐसा राजा जिसका चारों दिशाओं में राज हो और उसे कोई चुनौती देने वाला ना हो। सम्राट विक्रमादित्य ने ना ही मात्र अरब और यूरोप को रौंदा था बल्कि रोम के राजा जुलियस सीज़र को भी युद्ध में हराकर बंदी बनाकर भारत की गलियोँ में घुमाया था।

राजा विक्रमादित्य ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया था। राजा विक्रमादित्य ने मात्र 20 वर्ष की उम्र में ही शकों को ना ही मात्र भारतवर्ष की सीमाओं से बल्कि पूरे एशिया से ही खदेड़ दिया था। ज्ञात हो कि उस समय भारत की सीमाएं आज के अरब यूरोप और पूर्वी एशिया तक फैली हुयी थीं।

विक्रमादित्य भारत और एशिया को स्वतंत्र करवाने के बाद वे खुद राजगद्दी पर नहीं बैठे बल्कि अपनेँ बड़े भाई भृर्तहरी को राजा बनाया पर पत्नी से मिले धोखे ने भृर्तहरी को सन्यासी बना दिया और उसके जब पश्चात् भृर्तहरी के पुत्रों ने भी राजसिँहासन पर बैठने से मना कर दिया तब राजा विक्रमादित्य को ही राजसिँहासन पर बैठना पड़ा।राजा विक्रम का राज्याभिषेक पवित्र दीपावली के दिन हुआ था। उन्होंने शकों पर विजय हासिल कर विश्व के प्रथम कैलेँडर विक्रम संवत की स्थापना की थी।

“विक्रमादित्य” की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे) उल्लेखनीय हैं ।

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