क्या वाकई शाहजहां के अपनी बेटी जहांआरा से थे नाजायज ताल्लुकात !

0
505

जहांआरा की गिनती मुग़ल काल की सबसे सुसंस्कृत महिलाओं में होती थी.वो शाहजहाँ की बेटी थीं या औरंगज़ेब की बहन थीं. वो अपने आप में एक मुकम्मल शख़्सियत थीं. जब वो सिर्फ़ 17 साल की थीं तो उनकी माँ का इंतक़ाल हो गया था और उन्हें पादशाह बेगम बनाया गया था जो उस ज़माने में किसी औरत के लिए सबसे बड़ा ओहदा था. जब वो पादशाह बेगम बनती हैं तो वो अपने यतीम भाई बहनों को तो संभालती ही हैं, अपने बाप को भी सहारा देती हैं जो अपनी बीवी के इंतेक़ाल के बाद बहुत ग़मज़दा थे.”शाहजहाँ के शासनकाल में जहाँआरा का ऐसा रुतबा था कि हर महत्वपूर्ण फ़ैसला उनकी सलाह से लिए जाते थे. उस ज़माने में भारत आए कई पश्चिमी इतिहासकारों ने उस समय प्रचलित ‘बाज़ार गॉसिप’ का ज़िक्र किया है जिसमें शाहजहाँ और उनकी बेटी जहांआरा के बीच नाजायज़ संबंधों की बात कही गई है.

कई इतिहास कार इसे कोरी गप्प बताते हुए कहते हैं कि जब ये पश्चिमी यात्री भारत आते थे तो उन्हें ये देख कर बहुत हैरानी होती थी कि मुग़ल बेगमें कितनी ताक़तवर होती थीं. इसके ठीक उलट उस ज़माने की अंग्रेज़ औरतों के पास उस तरह के अधिकार नहीं थे. उन्हें इस बात पर ताज्जुब होता था कि बेगमें व्यापार कर रही हैं और उन्हें हुक्म दे रही हैं कि वो इस चीज़ का व्यापार करें. इसका कारण उन्हें लगता था कि उनके शाहजहाँ के साथ ग़लत संबंध हैं. वो ऐसा मानते थे कि शाहजहाँ के अपनी बेटी से ग़लत संबंध हैं, तभी तो वो उन्हें इतने ढ़ेर सारे अधिकार मिले हैं.’

बर्नियर ने लिखा है, ”उस ज़माने में हर जगह चर्चा थी कि शाहजहाँ के अपनी बेटी के साथ नाजायज़ ताल्लुक़ात हैं. कुछ दरबारी तो चोरी-छिपे ये कहते सुने जाते थे कि बादशाह को उस पेड़ से फल तोड़ने का पूरा हक़ है जिसे उसने ख़ुद लगाया है.”

‘सिर्फ़ बर्नियर ने शाहजहाँ और जहांआरा के नाजायज़ संबंधों की बात लिखी है. वो औरंगज़ेब के साथ थे और उन्हें दारा शिकोह से बहुत रंजिश थी. उस वक्त भी ये कहा जाता था कि ये बाज़ार गॉसिप है और ग़लत है. बर्नियर उत्तराधिकार की लड़ाई में औरंगज़ेब का साथ दे रहे थे और जहाँआरा दाराशिकोह के साथ थीं, इसलिए उन्होंने इस तरह की अफ़वाहें फैलाईं. बहुत पहले से ये परंपरा चली आ रही है कि अगर आपको किसी औरत को नीचा दिखाना हो तो उसके चरित्र पर कीचड़ उछाल दीजिए.”

दारा शिकोह का साथ देने के बावजूद औरंगज़ेब ने शाहजहाँ की मौत के बाद जहांआरा को पादशाह बेगम का ख़िताब दिया. इरा मुखोटी बताती हैं, ”उत्तराधिकार की लड़ाई में औरंगज़ेब की छोटी बहन रोशनारा बेगम ने उनका साथ दिया था, लेकिन औरंगज़ेब ने बड़ी बहन जहाँआरा बेगम को ही पादशाह बेगम बनाया. रोशनारा बेगम को हमेशा अपने भाई से शिकायत रही कि उन्हें वो नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था.”

सितंबर 1681 में 67 साल की उम्र में जहांआरा का निधन हो गया. उनकी मौत की ख़बर औरंगज़ेब के पास तब पहुंची, जब वो अजमेर से डेकन जाने के रास्ते में थे. उन्होंने जहाँआरा की मौत का शोक मनाने के लिए शाही काफ़िले को तीन दिनों तक रोक दिया.जहांआरा को उनकी इच्छानुसार दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया की मज़ार के बग़ल में दफ़नाया गया.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here