महावीर आल्हा : इस वीर से पृथ्वीराज चौहान को भी प्राणों की भीख मांगनी पड़ी

उदल की मृत्यु की सूचना पाते ही ‘अाल्हा’ क्रोधित हो उठे. उन्होंंने दुश्मन पर अपने प्रहार तेज कर दिए और अंत में पृथ्वीराज को पराजित करने में सफल रहे.यही नहीं ‘अाल्हा’ अपने भाई की मृत्यु के प्रतिशोध की आग में पृथ्वीराज चौहान को मारने ही वाला थे, तभी उनके गुरु गोरखनाथ आ गये. उन्होंने कहा कि प्रतिशोध के लिए किसी की जान लेना धर्म नहीं है. गुरु की आज्ञा मानते हुए ‘अाल्हा’ ने पृथ्वीराज को प्राणदान दे दिया.

0
723

भारत वीरों की भूमि है. इसके हर राज्य का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है. बुंदेलखंड उसी में से एक है. . यहां कई वीर हुए, जिन्होंने अपनी वीरता से इतिहास के पन्नों में अपना स्वर्णिम नाम जोड़ा है.’‘आल्हा’ एक ऐसे वीर योद्धा थे, जिन्होंंने जीवन में कभी पराजय का सामना नहीं किया. यहांं तक कि उन्होंने पृथ्वी राज चौहान जैसे वीर योद्धा तक को मात दे दी थी.

‘आल्हा’ का जन्म दसरापुर के जागीरदार तथा राजा परमाल के वफ़ादार दस्सराज के घर हुआ था. उनकी उम्र बहुत कम थी, जब उनके पिता रणभूमि में दुश्मनों के हाथों मारे गए. पिता की मृत्यु के बाद राजा परमाल ने उनका पालन पोषण किया. माना जाता है कि वह राजा परमाल की पत्नी मलिन्हा के बहुत प्रिय थे. वह उन्हें अपनी संतान की तरह लाड़ करती थीं.आल्हा’ जैसे ही थोड़े बड़े हुए उन्हें राजा परमाल ने शिक्षा के लिए भेज दिया. इस तरह ‘आल्हा’ ने शिक्षा के साथ-साथ ऱणकौशल के गुर सीखे. ‘आल्हा’, जब वापस लौटे तो उनकी वीरता का सभी ने लोहा माना. इसी के चलते जल्द ही राजा परमाल ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति घोषित कर दिया. बस यही बात रानी मलिन्हा के भाई माहिल को खटक गई.

वह ‘आल्हा’ को नीचा दिखाने की कोशिश करता रहता था. कई बार उसने इसके लिए षडयंत्र भी रचे… किन्तु किसी न किसी वजह से वह फेल हो जाता था. इसी क्रम में उसने ‘आल्हा’ को राज्य से बाहर करने का पुख्ता प्लान तैयार किया. उसने राजा परमाल को भड़काते हुए कहा कि वह ‘आल्हा’ से अपना प्रिय घोड़ा भेंट करने के लिए कहें.शुरुआती आनाकानी के बाद राजा परमाल इसके लिए सहमत हो गये. उन्होंने ‘आल्हा’ को बुलाया और अपनी बात रखी. इत्तेफाक से ‘आल्हा’ ने अपना घोड़ा माहिल को देने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा, ‘एक सच्चा राजपूत भले ही किसी के लिए अपने प्राण हंसते हुए दे दे, मगर अपने अस्त्र-शस्त्र और घोड़ा किसी को नहीं दे सकता’.इस इनकार से नाराज परमाल ने आल्हा को देश निकला दे दिया .

.आल्हा’ के महोबा से जाते ही पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर हमले की घोषणा कर दी. हमले की सूचना मिलते ही रानी मलिन्हा ने राजा परमाल से ‘आल्हा’ को वापिस बुलाने की विनती की.राजा की सूचना मिलते ही ‘आल्हा’ जल्द ही पृथ्वीराज चौहान से लोहा लेने वापस महोबा पहुंच गये.

महोबा पहुंचते ही ‘आल्हा’ ने मोर्चा संभाल लिया. उनके साथ उनके भाई उदल भी थे. कहते हैं कि उदल बिल्कुल आल्हा की परछाई थे. वह भी इतने वीर थे कि सामने से उसे मार पाना लगभग असम्भव था!पृथ्वीराज की सेना इस बात को समझती थी. वह जानती थी कि आल्हा को खत्म करने से पहले उसे उदल को अपने रास्ते से हटाना पड़ेगा. वह जानती थी कि जब तक उदल खड़ा है, तब तक एक कदम भी आगे बढ़ना आसान नहीं होगा. खैर, वह युद्ध के मैदान में थे, इसलिए किसी भी कीमत पर उन्हें आगे बढ़ना था. इसके लिए उन्होंंने एक प्लान के तहत उदल पर हमला बोल दिया.

इसी बीच दुश्मन को मारते हुए उदल पृथ्वीराज के नजदीक पहुंच गया. वह उन्हें मारने वाला ही था, तभी पृथ्वीराज के सेनापति चामुंडा राय ने उदल के पीठ पर वार कर उसकी हत्या कर दी. उदल की मृत्यु की सूचना पाते ही ‘अाल्हा’ क्रोधित हो उठे. उन्होंंने दुश्मन पर अपने प्रहार तेज कर दिए और अंत में पृथ्वीराज को पराजित करने में सफल रहे.यही नहीं ‘अाल्हा’ अपने भाई की मृत्यु के प्रतिशोध की आग में पृथ्वीराज चौहान को मारने ही वाला थे, तभी उनके गुरु गोरखनाथ आ गये. उन्होंने कहा कि प्रतिशोध के लिए किसी की जान लेना धर्म नहीं है. गुरु की आज्ञा मानते हुए ‘अाल्हा’ ने पृथ्वीराज को प्राणदान दे दिया.किन्तु, इस युद्ध के बाद वह खुद बैरागी हो गये. ‘अाल्हा’ की निस्वार्थ राज्यभक्ति ने उन्हें लोगों के बीच लोकप्रिय किया.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here