बंदा बहादुर सिंह का इतिहास दिखाता है मुगलों का असली चेहरा

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बंदा सिंह बहादुर एक योद्धा थे लेकिन एक योद्धा से पहले वह एक सन्यासी थे. बंदा सिंह बहादुर का सबसे पहला नाम माधो दास था. इनका जन्म 1670 ईसवी में कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में हुआ था.जब गुरु गोविन्द सिंह जी की चमकौर के युद्ध में मुगलो से पराजय हुई और उनके दो, सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या कर दी गयी तो उसके बाद गोविन्द सिंह जी लक्ष्मण दास यानी कि बन्दा बहादुर से मिले थे. तब गुरूजी ने बन्दा बहादुर सिंह को बोला था कि बंदे अगर राजपूत ही सन्यासी बन जायेगा तो इस देश व् धर्म की रक्षा कौन करेगा. गुरु जी से मिलने के बाद बंदा बहादुर को समझ आ गया था कि वह एक योद्धा है.

गुरु गोविंद सिंह जी के ज्ञान और उनके पुत्रों बलिदान किया हुआ जीवन इनको इतना प्रभावित कर दिया कि वह शस्त्र उठाने के लिए तैयार हो गए. तभी 1709 ईस्वी में अपनी माँ अपने देश की रक्षा करने के लिए पंजाब पहुंच गये और वहां जाते ही सिखों के साथ मिलकर जनता को परेशान कर रहे हजारों मुगलों को मौत के घाट उतार दिया. कहते हैं कि बन्दा बहादुर अकेले इस युद्ध में ऐसे लड़ रहा था कि जैसे यह इसका आखरी युद्ध हो. अकेले ही बन्दा बहादुर 5 मुगल सैनिकों से एक ही बार में अकेले लड़ रहा था. यह सब हो जाने के बावजूद बंदा सिंह बहादुर कहां रुकने वाले थे. इन्होनें सरहिंद के फौजदार वजीर खान को मौत हवाले किया.

सके बाद उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में कब्जा किया. अमृतसर और जालंधर में बेसहारा लोगों के अधिकार के लिए लड़ाई भी लड़ी. यहां तक कि किसानों की जमीन उनको वापस लौटा दिए. लाहौर के पूर्व हिस्से में और पूरे पंजाब सिखों के शासन में मुगलों की राजधानी दिल्ली और लाहौर के बीच का बातचीत का माध्यम पूरी तरीके से खत्म करा दिया. यह सुनकर मुगल बादशाह बहादुर परेशान हो गए.

फ़रवरी, 1716 में बन्दा बहादुर और उनके 794 साथियों को कैद करके दिल्ली ले जाया गया। उन्हें अमानुषिक यातनाएँ दी गईं। प्रतिदिन 100 की संख्या में सिक्ख फाँसी पर लटकाए गए। बन्दा के सामने उनके पुत्र को मार डाला गया। जब उनकी बारी आई, तो बन्दा सिंह ने मुसलमान न्यायाधीश से कहा कि- “उनका यही हाल होना था, क्योंकि अपने प्यारे गुरु गोबिन्द सिंह की इच्छाओं को पूरा करने में वह नाक़ाम रहे।” उन्हें लाल गर्म लोहे की छड़ों से यातना देकर मार डाला गया.मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर के आदेश पर बन्दा के शरीर को गर्म चिमटों से नुचवाया गया और फिर हाथी से कुचलवाकर मार डाला गया।

यह घटना 16 जून, 1716 ई. को घटी थी।बादशाह फर्रुखसियर ने बन्दा बहादुर को आखरी समय में भी सिख धर्म को छोड़ इस्लाम लेने को बोला लेकिन बन्दा बहादुर ने शहीद होना स्वीकार किया किन्तु गुरु गोविन्द का दिया धर्मं नहीं छोड़ा.

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