शिवाजी महाराज ने अपने पिता शाहजी को आदिलशाह की कैद से कैसे छुड़ाया

शाहजहाँ पहले से ही आदिलशाह से चिढ़ा हुआ था और दूसरा शिवाजी ने जब किले सौंपने की बात कही तो उसका ईमान डोल गया .उसने तुरंत अपने दूत को बीजापुर इस सन्देश के साथ रवाना किया कि सन्देश मिलते ही शाहजी को आजाद कर दिया जाए वरना अंजाम भगतने के लिए तैयार रहें.

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छत्रपति शिवाजी महाराज जितने बहादुर थे उतने ही बड़े कूटनीतिज्ञ भी .उन्होंने स्वराज्य की स्थापना के लिए अपने दुश्मनों के खिलाफ हर रणनीति अपनाई जिसमें वीरता और कूटनीति का अद्भुत मिश्रण देखा जा सकता है .अपने इन्हीं गुणों के कारण महाराज ने एक बार अपने पिता शाहजी को बीजापुर के सुलतान आदिल शाह की कैद से बिना रक्तपात के छुडा लिया था.

शिवाजी के पिता शाहजी आदिलशाह के मुलाजिम थे .लेकिन शिवाजी को अपने उद्देस्श्य की पूर्णता के लिए आदिलशाह सबसे बड़ा ख़तरा नज़र आते थे. इसलिए उन्होंने छापामार युद्ध नीति का सहारा लेते हुए आदिलशाह के एक एक किले को अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया. जब महाराज ने कोंकण के किले पर भगवा झंडा फहरा दिया तो आदिलशाह ने शिवाजी को सबक सिखाने की ठानी लेकिन उनकी लाख कोशिशों के बावजूद महाराज उनकी पकड़ में नहीं आए. तब आदिलशाह ने शाहजी के जरिये शिवाजी को पकड़ने का जाल बिछाया .आदिलशाह ने शाहजी को दरबार में बुलाकर आदेश दिया कि या तो वो अपने पुत्र शिवाजी को सात दिनों के अन्दर दरबार में हाजिर करें वरना उन्हें मृत्यदंड दिया जाएगा .शाहजी ने इस आशय का एक सन्देश महाराज को भेजा भी लेकिन शिवाजी आदिलशाह की चालाकी समझ गए और इस सन्देश का कोई उत्तर ही नहीं दिया .नाराज आदिलशाह ने शाह जी को कैद कर लिया .कैद में शाह जी को भयंकर यातनाएं दी जाती और इसकी खबर महाराज तक पहुंचाई जाती ताकि पिता प्रेम के कारण वो दरबार में हाजिर हो जाएं .गुस्से में शिवाजी ने आदिलशाह के एक एक सरदारों को मारकर उनके कई किलों पर कब्जा जमा कर अपना जवाब आदिलशाह को भेजते रहते .

इधर एक दिन आदिलशाह ने शाह को ऐसी कोठरी में बंद करने का आदेश दिया जिसमें हवा आने के लिए सिर्फ एक छोटा सा छिद्र हो ताकि शाहजी खुद ही घुट घुट कर इस कैद में दम तोड़ दें. शाहजी समझ गए कि अब उनका अंत समय आ गया है .उन्होंने एक भावप्रवण सन्देश महाराज के पास भेजा और उनसे हमेशा के लिए विदा माँगी .अपने पिता को इस तरह तिल तिल मरता देख महाराज ने एक योजना बनाई .उन्होंने मुग़ल सम्राट शाहजहा को सन्देश भेजा कि वो आदिलशाह के सारे किले उनके हवाले कर देंगे अगर वो उनके पिता को आदिलशाह की कैद से छुडाने में उनकी मदद करें .शाहजहाँ पहले से ही आदिलशाह से चिढ़ा हुआ था और दूसरा शिवाजी ने जब किले सौंपने की बात कही तो उसका ईमान डोल गया .उसने तुरंत अपने दूत को बीजापुर इस सन्देश के साथ रवाना किया कि सन्देश मिलते ही शाहजी को आजाद कर दिया जाए वरना अंजाम भगतने के लिए तैयार रहें.

आदिलशाह में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो मुग़ल बादशाह के हुक्म को टाल सके .इस तरह शाहजी आदिलशाह की कैद से आजाद हो गए .

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