जब हल्दीघाटी के युद्ध में दुश्मन शक्ति सिंह ने ही बचाए महाराणा के प्राण

विद्रोही भाई की इस मदद से प्रताप की आँखें भर आई और उन्होंने शक्ति सिंह को गले लगा लिया .अगर अंतिम समय पर शक्ति सिंह का भाई प्रेम नहीं जागता तो उस दिन महाराणा की मृत्य तय थी.

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भारत का इतिहास ऐसे ऐसे शासकों की कहानियों से भरा है जब सत्ता पाने के लिए राजाओं ने अपने भाइयों के क़त्ल से भी गुरेज नहीं किया. इसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों शासक शामिल थे ,लेकिन राजपूतों का एक इतिहास ऐसा भी है जब एक सौतेले भाई ने युध्भूमि में अपने बड़े भाई की जान बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी .ये कहानी है महाराणा प्रताप और उनके सौतेले भाई शक्ति सिंह की जिनकी वजह से हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की जान बची थी .

महाराणा और शक्ति सिंह में कभी जमी नहीं .राणा उदय सिंह ने अपने बड़े पुत्र जगमाल को अपना वारिस घोषित किया था .लेकिन मेवाड़ के सरदारों ने उन्हें अपना राजा मानने से इंकार करते हुए राणा प्रताप को गद्दी पर बैठा दिया .इससे शक्ति सिंह काफी नाराज था और अक्सर राणा को अपमानित किया करता था .एक दिन नाराज राणा ने शक्ति सिंह को देश निकाला दे दिया .राणा से बदला लेने की नीयत से शक्ति सिंह अकबर के दरबार में पहुँच गया. जब अकबर ने महाराणा प्रताप के खिलाफ युद्ध का ऐलान किया तो उसकी सेना में शक्ति सिंह को भी शामिल किया गया .

हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की भारी भरकम सेना के सामने महाराणा की सेना कमजोर पड़ गई .भीषण नरसंहार के बाद खुद राणा भी दुश्मन सैनिकों से घिर गए .तब झालामान ने अपना बलिदान देकर महाराणा को युद्ध भूमि से निकलने में मदद की.

युद्ध में घायल होने के बाद वे बिना किसी सहायक के अपने पराक्रमी चेतक पर सवार होकर पहाड़ की ओर चल पड़े। उनके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे, परन्तु चेतक ने प्रताप को बचा लिया। रास्ते में एक पहाड़ी नाला बह रहा था। घायल चेतक फुर्ती से उसे लाँघ गया, परन्तु मुग़ल उसे पार न कर पाये।चेतक नाला तो लाँघ गया, पर लेकिन बुरी तरह घायल होकर गिर पड़ा .इससे पहले मुग़ल सैनिक महाराणा के पास आ पहुंचे .शक्ति सिंह ने उन सैनिकों को मारकर अपना घोड़ा प्रताप को दे दिया और उन्हें वहां से भाग जाने को कहा.

अपने विद्रोही भाई की इस मदद से प्रताप की आँखें भर आई और उन्होंने शक्ति सिंह को गले लगा लिया .अगर अंतिम समय पर शक्ति सिंह का भाई प्रेम नहीं जागता तो उस दिन महाराणा की मृत्य तय थी.

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