कल्ला जी राठौड़ : शीश कट जाने के बाद चाचा जयमल को पीठ पर लाद कर लड़ता रहा ये योद्धा

कल्ला जी का सिर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा। अनेक मुग़लो को मार कर वे भी रण खेत रहे। ऐसी मान्यता है कि कल्ला जी का धड़ अपने ठिकाने रनेला पहुंचकर शान्त हुआ .अकबर ने चित्तोड़ पर आक्रमण के बाद किले में प्रवेश कर वहाँ निवास कर रहे 30,000 निर्दोष स्त्री,पुरूष ओर बच्चों को कत्ले आम कर अपनी जीत का जश्न मनाया।

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राजस्थान की पुण्य धरा पर अनेको वीर हुए है । उन्ही में से एक प्रसिद्ध लोकदेवता वीरवर कमधज कल्ला राठौड़ हुए। जिनकी वीरता से न केवल मेवाड़ अपितु समस्त भारत गौरवान्वित हुआ है । कल्ला जी का जन्म विक्रम सवन्त 1601 में मेड़ता प्रान्त में हुआ था ।कल्ला राठोड़ की वीरता, शैार्य और पराक्रम को देखकर चित्तौड़ के महाराणा उदय सिंह ने उन्हें रनेला का जागीरदार घोषित कर दिया ।

1567 में अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी । पूरे 6 माह बीतने पर भी उसे कोई सफलता नहीं मिली । इस निर्णायक युद्ध में जयमल जी राठोड़ के घुटने पर चोट लगने के कारण वे अपने भतीजे कल्ला जी राठौड़ के कन्धे पर बैठ कर युद्ध करने आये। इनके चतुर्भुज स्वरूप ने मुग़लो पर कहर बरपा दिया।यह देख अकबर भी हतप्रभ रह गया। इन्हें रोकने का प्रयास किया गया। पर सब असफल । अन्त में इनका बल क्षीण करने के लिए इनके ऊपर गौ मांस और रक्त फेंका गया।जिससे दोनों बुरी तरह बौखला गए .

इसका लाभ उठा कर मुगलों ने पीछे से वार कर जयमल जी और कल्ला जी के मस्तक काट लिए । कल्ला जी का सिर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा। अनेक मुग़लो को मार कर वे भी रण खेत रहे। ऐसी मान्यता है कि कल्ला जी का धड़ अपने ठिकाने रनेला पहुंचकर शान्त हुआ .अकबर ने चित्तोड़ पर आक्रमण के बाद किले में प्रवेश कर वहाँ निवास कर रहे 30,000 निर्दोष स्त्री,पुरूष ओर बच्चों को कत्ले आम कर अपनी जीत का जश्न मनाया।

यह है मानवतावादी “अकबर दी ग्रेट ” का असली चेहरा। जिसने मानव सभ्यता के चेहरे पर कालिख पोत दी। इंसानियत का धर्म भूला दिया।

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