जब औरंगजेब के शहजादे अकबर ने की तख्तापलट की कोशिश

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औरंगजेब की दमनकारी नीतियों के कारण उनके शासन काल में कई विद्रोह हुए जिसे उसने बड़ी सख्ती से दबा दिया। लेकिन एक विद्रोह ऐसा था जब सचमुच औरंगजेब को अपनी गद्दी खिसकती हुई लगी। ये विद्रोह था उसके ही साहेबजादे अकबर का।  अकबर ने दुर्गादास के बहकावे में आकर अपने पिता के ख़िलाफ़ विद्रोह की घोषणा करते हुए स्वयं को 11 जनवरी, 1681 ई. को भारत का सम्राट घोषित कर दिया। उस समय अजमेर में पड़ाव डाले औरंगज़ेब के पास इतने भी सैनिक नहीं थे कि, वह विद्रोही शाहज़ादे को दण्ड दे सके।  औरंगज़ेब कूटनीति के सहयोग के सहारे दुर्गादास को अकबर से अलग करने में सफल हुआ। राजपूतों के सहयोग के अभाव में अन्ततः अकबर के समर्थक मुग़ल सम्राट की सेना में मिल गये। यह सब 12 जनवरी, 1681 ई. को अजमेर के ‘दोराहा’ नामक स्थान पर हुआ, जहाँ पर दोनों ओर की सेनायें आमने-सामने थीं। अकबर राजपूतों की सहायता से निराश होकर अन्ततः शिवाजी के पुत्र शम्भुजीके पास चला गया, जहाँ पर 1704 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। 

 ये ऐसा विद्रोह था , जब राजपूत और अकबर मिलकर औरंगज़ेब का तख्ता पलट सकते थे, किन्तु औरंगज़ेब ने छल नीति से राजपूतों और अकबर में फूट पैदा कर दी। जब दुर्गादास को वास्तविकता का पता लगा तो वह अकबर को ख़ानदेश बगलाना होते हुए मराठा राजा शम्भुजी के दरबार में ले गया। दुर्गादास ने बहुत प्रयत्न किया कि राजपूत, मराठा और अकबर की फ़ौजें मिलकर औरंगज़ेब से युद्ध करें, लेकिन  शम्भुजी इसके लिए तैयार नहीं हुआ। दरअसल शम्भू जी या संभा जी महाराज को अकबर के चरित्र पर भरोसा नहीं था।

अकबर काफी अस्थिर चित्त और उतावला रहता था। उसे अपने आप को हिंदुस्तान का बादशाह कहलाने की इतनी जल्दी थी कि वो युद्ध रणनीतियों को समझ ही नहीं पाता था. संभा जी को लगता था कि इस उतावले शहजादे के बहकावे में आकर अगर उन्होंने औरंगजेब के खिलाफ युद्ध छेड़ा तो हार निश्चित है। दूसरा औरंगजेब ने राजपूतों से वादा किया कि अगर राजपूत अकबर का साथ ना दें तो वो अजीत सिंह को मारवाड़ का राजा मान लेंगे। इसलिए राजपूत भी इस गठजोड़ से अलग हो गए। हालाँकि अकबर की मौत के बाद औरंगजेब इस वादे से मुकर गया। इस तरह छल-बल से औरंगजेब अपने शहजादे को विद्रोह को दबाने में सफल रहा। 

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