शाहजहाँ ने शुरू की थी भाइयों को मार कर तख़्त हासिल करने की परंपरा

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तख़्त के लिए अपने भाइयों को तख्ते पर टांग देना मुगलों की पुरानी रवायत रही .शाहजहाँ ने इस परम्परा की शुरुआत की जिसे औरंगजेब और बाद के मुग़ल बादशाहों ने खूब निभाया .शाहजहाँ द्वारा अपने बड़े भाई खुसरो का क़त्ल मुगलिया सल्तनत की ऐसी घटना थी जिसने आगे चलकर एक रस्म का ही रूप ले लिया और जो जीता वही सिकंदर वाले अंदाज़ में इसे जरुरी मान लिया गया .

अकबर का पोता और जहाँगीर का बड़ा बेटा खुसरो काफी बुद्धिमान और सूझ बूझ वाला शख्स था .अपने शासन काल में जहाँगीर की हरकतों से तंग आकर अकबर ने खुसरो को ही अपना वारिस बनाने का मन बना लिया था लेकिन दरबारियों के बीच-बचाव के कारण आखिरकार अकबर ने जहांगीर को माफ़ कर दिया. जहांगीर की वास्तविक सत्ता नूरजहां के हाथों में थी जिससे खुसरो काफी नाराज रहता और अक्सर भरे दरबार में जहांगीर की तौहीन कर देता। लेकिन जहांगीर ने कभी खुसरो की हरकतों को जयादा तवज्जो नहीं दी. नाराज खुसरो ने 6 अप्रैल 1606 को जहांगीर के खिलाफ बगावत कर दी जिसके बाद उसे पकड़ कर कारागार में डाल दिया गया। लेकिन खुसरो अकबर की मजार पर जाने का बहाना कर कैद भाग निकला और सीधे पंजाब जा पहुंचा.

पंजाब में उसने 12000 सैनिकों को इकठ्ठा कर खुद को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया जिसके बाद जहांगीर ने इस विद्रोह को दबाने के लिए एक विशाल सेना भेजी। भजवाल के मैदान में खुसरो और मुग़ल सेना का आमना -सामना हुआ। इस युद्ध में खुसरो की हार हुई और उसे बंदी बनाकर जहांगीर के सामने पेश किया गया। जहांगीर अपने इस बेटे से काफी प्यार करता था इसलिए इस विद्रोह के लिए खुसरो को मौत की सजा देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और उसे कारगार में डाल दिया गया। खुसरो 14 साल तक कैद में रहा। आखिरकार जहांगीर ने उसे कैद से आजाद करने का हुक्म दिया। लेकिन आजाद होते ही खुसरो ने फिर से वही हरकतें शुरू कर दी जिससे तंग आकर जहांगीर ने उसे खुर्रम यानी शाहजाहाँ की कस्टडी में बुरहानपुर भेज दिया गया।

शाहजहां जानता था की खुसरो के रहते वो कभी भी जहांगीर का वारिस नहीं बन सकता। इसलिए उसने खुसरो के क़त्ल का आदेश दे दिया। जैसे ही ये खबर खुसरो को मिली उसने भागने की कोशिश की लेकिन शाहजहां के सैनिकों ने उसे मार गिराया। शाहजहां ने जहांगीर को खबर भेजी की हैजे के कारण खुसरो की मौत हो गई लेकिन जहांगीर ने इसपर यकीन नहीं किया और जांच के लिए अपने सरदारों को भेजा।लेकिन हकीकत जहांगीर तक पहुँच नहीं पाया क्योंकि उसके सारे सरदार शाहजहां को अकेला वारिस मानकर उनसे जा मिले। इस तरह खुसरो की मौत रहस्य बन कर ही रह गया और ये मुगलिया सल्तनत की परम्परा बन गया।

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