मुराद बख्श:अपनी रखैल के कारण मुग़ल सम्राट बनने से चूक गया ये शहजादा

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शाहजहाँ के चारो बेटों-दारा शिकोह,औरंगजेब,शाह शुजा और मुराद में से सबसे छोटा मुराद बख्श सबसे साहसी और योग्य था. शाहजहाँ के शासन काल में उसने कई विद्रोह का सफलता पूर्वक दमन किया था .इसलिए शाहजहाँ ने उसे गुजरात का सूबेदार बना दिया था .मुराद एक वीर योद्धा अवश्य था लेकिन वो विलासी और पियक्कड़ था और यही उसके विनाश का कारण भी बना .

शाहजहाँ के उत्तराधिकार की लड़ाई में औरंगजेब को सबसे ज्यादा ख़तरा मुराद से ही था. औरंगजेब जानता था कि वो दारा शिकोह और शाह शुजा से आसानी से निपट सकता है लेकिन मुराद की सैनिक योग्यता को देखते हुए वो उससे काफी भयभीत रहता था. इसलिए औरंगजेब ने उससे भिड़ने के बजाय कूटनीति से काम लिया और उसे अपने साथ मिला लिया .औरंगजेब ने मुराद को प्रलोभन दिया कि अगर औरंगजेब दारा और शुजा को हारने में सफल होता है तो पूरी मुग़ल सल्तनत का दो हिस्सों में बँटवारा किया जाएगा .साम्राज्य की विजय के बाद पंजाब, अफ़ग़ानिस्तान, काश्मीर एवं सिंध मुराद को मिलेंगे, जो वहाँ बादशाहत का झण्डा गाड़ेगा, सिक्के चलाएगा तथा बादशाह के रूप में अपना नाम घोषित करेगा। मुराद औरंगजेब की इसी चाल में फंस गया और उसके साथ मिलकर दारा के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हो गया.

29 मई 1657 को औरंगजेब और मुराद की सेना ने मिलकर दारा की शाही सेना को परास्त कर दिया. 13 जून 1658 को औरंगजेब की विजयी सेना आगरे के किले पर कब्ज़ा करने के लिए आगे बढ़ी.तब तक मुराद को औरंगजेब के इरादों की भनक लग चुकी थी .इसलिए वो मथुरा में ही ठहर गया .भेद खुलते ही औरंगजेब ने मुराद को बंदी बनाने का आदेश दिया. जब औरंगजेब के सैनिक मुराद को गिरफ्तार करने पहुंचे वो अपनी रखैल सरस्वती देवी के साथ ऐश कर रहा था .खबरी ने जब मुराद को सैनिक के आने की खबर दी तो मुराद भागने की कोशिश करने लगा .लेकिन सरस्वती देवी उससे बुरी तरह लिपट गई और रोने लगी .

जब तक मुराद अपनी इस रखैल को समझा पाता तब तक औरंगजेब के सैनिकों ने पहुँच कर उसे बंदी बना लिया .शाहज़ादे को सलीमगढ़ के दुर्ग में बन्दी बनाकर रखा गया। जनवरी, 1659 ई. में उसे वहाँ से ग्वालियर के क़िले में ले जाया गया। 4 दिसम्बर, 1661 ई. को दीवानअली नकी की हत्या करने के अभियोग में उसे फाँसी पर लटका दिया गया।

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