बहादुरशाह प्रथम: औरंगजेब के इस बेटे को मिला था ‘शाहे बेखबर’ का ख़िताब

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औरंगजेब की मौत के बाद उनके बेटों मुअज्जम और काम बख्श के बीच उतराधिकार की भयंकर लड़ाई छिड़ गई. औरंगजेब ने मुअज्जम को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त कर रखा था. लेकिन जब औरंगजेब की बीमारी की खबर उसके पास पहुँची तो वो पिटा को देखने के बहाने औरंगजेब के पास बुरहानपुर आ गया .जहाँ पहले से ही औरंगजेब का चहेता शहजादा काम बक्श मौजूद था .औरंगजेब अपने इस शहजादे को बहुत चाहते था और उसकी ख्वाहिश थी कि उसके बाद काम बख्श ही मुगलों की गद्दी संभाले .लेकिन मुअज्जम ने बड़ी चालाकी से काम बख्श को राजपूतों का विद्रोह दबाने भेज दिया और किसी ना किसी बहाने बीमार औरंगजेब के पास डटा रहा .

1607 में जब औरंगजेब की मौत हुई तब मुअज्जम वहीं मौजूद था. पिता की मौत होते ही उसने बहादुर शाह के नाम से खुद को मुग़ल सम्राट घोषित कर दिया. इसके बाद उत्तराधिकार की लड़ाई में उसने अपने भाई आजमशाह और काम्बख्श को हरा दिया और 63 साल की उम्र में सिहांसन पर बैठा .बहादुरशाह प्रथम गद्दी पर बैठने वाला सबसे वृद्ध मुग़ल शासक था। जब वह गद्दी पर बैठा, तो उस समय उसकी उम्र 63 वर्ष थी। वह अत्यन्त उदार, आलसी तथा उदासीन व्यक्ति था। इतिहासकार ख़फ़ी ख़ाँ ने कहा है कि, बादशाह राजकीय कार्यों में इतना अधिक लापरवाह था, कि लोग उसे “शाहे बेख़बर” कहने लगे थे।

मराठों और मुगलों की दुश्मनी वैसे तो काफी समय से चली आ रही थी लेकिन बहादुरशाह के शासनकाल में इसने भयंकर रूप ले लिया .औरंगजेब ने शम्भा जी के पुत्र शाहू जी को कैदकर रखा थे जिसे बहादुरशाह ने मुक्त कर दिया .बहादुर शाह प्रथम की क़ैद से मुक्त शाहू ने आरंभ में तो मुग़ल आधिपत्य स्वीकार कर लिया, परन्तु जब बहादुर शाह प्रथम ने उसके ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ वसूल करने के अधिकार को स्पष्टतया स्वीकार नहीं किया, तब उसके सरदारों ने मुग़ल सीमाओं पर आक्रमण करके मुग़लों के अधीन शासकों द्वारा मुग़ल सीमाओं पर भी आक्रमण करने की ग़लत परंपरा की नींव डाली।

इस प्रकार मुग़लों की समस्या को बहादुर शाह प्रथम ने और गम्भीर बना दिया। 26 फ़रवरी, 1712 को बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के पश्चात् उसके चारों पुत्रों, जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह में उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हो गया। फलतः बहादुरशाह का शव एक मास तक दफनाया नहीं जा सका।

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