संभा जी औरंगजेब के खिलाफ उसके बेटे अकबर का साथ क्यों नहीं दिया

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भारतीय इतिहासकारों का मानना है कि शिवाजी महाराज अगर साहसी थे तो उनके पुत्र शभु जी राजे दुस्साहसी थे .हथियारों के सञ्चालन में वो पिता की अपेक्षा कहीं अधिक कुशल थे लेकिन राजनीति के मामले में उनमें दूरदर्शिता बिलकुल नहीं थी .शिवाजी महाराज हथियारों की अपेक्षा अपनी बुद्धि-विवेक से ज्यादा काम लेते थे जबकि संभा जी का जोर युद्ध पर अधिक रहता था .अपने नौ वर्षों के शासन काल में संभा जी ने एक ऐसे मौके को हाथ से जाने दिया जो भारत से मुगलों के शासन का अंत कर सकता था लेकिन संभाजी जी यहां चूक गए जिसका नतीजा उनके अंत के रूप में सामने आया .

औरंगजेब के शहजादे अकबर ने अपने पिता से विद्रोह कर दिया था .उसे राजपूतों का समर्थन प्राप्त था .राजपूत सरदार दुर्गादास राठौड़ चाहते थे कि औरंगजेब के खिलाफ इस मुहिम में मराठा राजा शम्भा जी का सहयोग मिल जाए तो औरंगजेब को ख़त्म किया जा सकता है .राठौड़ अकबर को लेकर संभा जी के पास पहुंचे .संभा जी ने अकबर की मेहमाननवाजी तो की लेकिन इस मामले में उसे कोई आश्वासन नहीं दिया .दरअसल संभा जी को इस शहजादे पर भरोसा नहीं था .दूसरी बात संभा जी के खिलाफ उनके पिता के कई विश्वसनीय सरदारों में काफी असंतोष था .इसलिए उन्हें शक था कि शायद इस मुहिम में उन्हें सफलता ना मिले .इसलिए उन्होंने शाहजादा अकबर को छः साल तक अपने राज्य में शरण तो दी लेकिन उनका साथ देने को तैयार नहीं हुए .निराश होकर शहजादा ईरान की तरफ भाग गया.

अकबर को शरण दिए जाने से औरंगजेब शम्भा जी से काफी नाराज हो गया था इसलिए वो अकबर का पीछा करता हुआ औरंगाबाद तक आ पहुंचा और उसने वहीं से संभा जी के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया. औरंगजेब किसी भी कीमत पर संभा जी को सबक सिखाना चाहता था इसलिए उसने उनके खिलाफ पूरी ताकत झोंक दी.आखिरकार संभाजी मुग़ल सैनिकों दवारा गिरफ्तार कर लिए गए .बाद में औरंगजेब ने कितनी यातना देकर उनका वध किया ये तो पूरा इतिहास जानता है. ये संभा जी राजनीतिक अदूरदर्शिता ही थी जिसकी वजह से वो औरंगजेब के खिलाफ अकबर का साथ देने से मुकर गए वरना आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता.

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