दुर्गादास राठौड़:एक अद्भुत योद्धा,जिसने औरंगजेब को नाकों चने चबबा दिए

औरंगजेब ने मारवाड़ के वारिस अजित सिंह की हत्या की ठान ली.औरंगजेब की इस नीयत को स्वामी भक्त दुर्गादास ने भांप लिया और मुकुंद दास की सहायता से स्वांग रचाकर अजित सिंह को दिल्ली से निकाल लाये . अजित सिंह के  लालनपालन की समुचित व्यवस्था करने के साथ जोधपुर में गद्दी के लिए होने वाले औरंगजेब  संचालित षड्यंत्रों के खिलाफ लोहा लेते अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ते  रहे।

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वीर दुर्गादास राठौड का जन्म मारवाड़ में करनोत ठाकुर आसकरण जी के घर हुआ था। आसकरण जी मारवाड़ राज्य की सेना में जोधपुर नरेश महाराजा जसवंत सिंह जी की सेवा में थे।दुर्गादास की वीरता की कहानियाँ सुनकर महाराज जसवंत सिंह ने दुर्गादास को अपनी सेना में भर्ती कर लिया।

उस समय महाराजा जसवंत सिंह जी दिल्ली के मुग़ल बादशाह औरंगजेब की सेना में प्रधान सेनापति थे,फिर भी औरंगजेब की नीयत  जोधपुर राज्य के लिए अच्छी नहीं थी और वह हमेशा जोधपुर हड़पने के लिए मौके की तलाश में रहता था । सं. 1731 में गुजरात में मुग़ल सल्तनत के खिलाफ विद्रोह को दबाने हेतु जसवंत सिंह जी को भेजा गया,इस विद्रोह को दबाने के बाद महाराजा जसवंत सिंह जी काबुल में पठानों के विद्रोह को दबाने हेतु चल दिए और दुर्गादास की सहायता से पठानों का विद्रोह शांत करने के साथ ही वीरगति को प्राप्त हो गए ।

उस समय उनके कोई पुत्र नहीं था और उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थी.दोनों ने एक एक पुत्र को जनम दिया.एक पुत्र की रास्ते में ही मौत हो गयी और दुसरे  पुत्र अजित सिंह को रास्ते का कांटा समझ कर औरंगजेब ने मारवाड़ के वारिस अजित सिंह की हत्या की ठान ली.औरंगजेब की इस नीयत को स्वामी भक्त दुर्गादास ने भांप लिया और मुकुंद दास की सहायता से स्वांग रचाकर अजित सिंह को दिल्ली से निकाल लाये . अजित सिंह के  लालनपालन की समुचित व्यवस्था करने के साथ जोधपुर में गद्दी के लिए होने वाले औरंगजेब  संचालित षड्यंत्रों के खिलाफ लोहा लेते अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ते  रहे।

अजित सिंह के बड़े होने के बाद गद्दी पर बैठाने तक वीर दुर्गादास को जोधपुर राज्य की एकता व स्वतंत्रता के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी.ओरंग्जेब का बल व लालच दुर्गादास को नहीं डिगा सका. जोधपुर की आजादी के लिए दुर्गादास ने कोई पच्चीस सालों तक संघर्ष  किया,लेकिन जीवन के अन्तिम दिनों में दुर्गादास को मारवाड़ छोड़ना पड़ा । महाराज अजित सिंह के कुछ लोगों ने दुर्गादास के खिलाफ कान भर दिए थे, जिससे महाराज दुर्गादास से अनमने रहने लगे. वक़्त की नजाकत  को भांप कर दुर्गादास ने मारवाड़ राज्य छोड़ना ही उचित समझा ।और वे मारवाड़ छोड़ कर उज्जेन चले गए. वही शिप्रा नदी के किनारे उन्होने अपने जीवन के अन्तिम दिन गुजारे और  वहीं उनका स्वर्गवास हुआ.

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