सत्ता सुख छोड़ना नहीं चाहता था बैरम खां,अकबर ने जबरन मक्का भेजा

अकबर को संदेह था कि बैरम खां की सत्ता की भूख इतनी बढ़ चुकी है कि उन्हें मक्का जाना शायद ही रास आये .इसलिए उसने अपने सूबेदार पीरजादा को बैरम खां के पीछे लगा दिया .जब बैरम खां को इसका पता चला तो उसे काफी दुःख पहुंचा और वो मक्का जाने की बजाय पंजाब जा पहुंचा और वहीं से अकबर के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया. अब युद्ध अकबर की मजबूरी बन गई.

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कहते हैं राजनीति में कोई अपना या पराया नहीं होता .लेकिन बादशाह अकबर की इस बात के लिए तारीफ़ जरुर की जानी चाहिए कि उसने अपने स्वामिभाक्तों के विद्रोह के बावजूद उनसे नरमी बरती .खानखाना यानि संरक्षक बैरम खां के मामले में अकबर का उदार चेहरा सामने आया जब उसने बैरम खान के विद्रोह को सख्ती से कुचल देने के बावजूद उसे प्राणदंड देने के बजाय सजा के तौर पर मक्का भेज दिया जहाँ रास्ते में ही किसी अफगान सरदार ने उसे मौत के घाट उतार दिया .

बैरम खां अकबर का संरक्षक था .13 साल की उम्र में जब अकबर गद्दी पर बैठा तो बैरम खां ने पानीपत के मैदान में हिन्दू सम्राट हेमू को हराकर अकबर का रास्ता साफ़ कर दिया .अकबर नाममात्र का शासक था लेकिन वास्तविक सत्ता बैरम खां के हाथों में थी .लेकिन जब अकबर 18 साल का हुआ तो उसने राज काज खुद संभालना शुरू कर दिया जिससे बैरम खान का रूतबा घटने लगा .इससे दरबार में ही एक सामानांतर सत्ता खड़ी हो गई .कुछ सरदार अकबर के पक्ष में तो कुछ बैरम खान के पक्ष में खड़े हो गए और दोनों पक्षों में टकराव शुरू हो गया .लेकिन अकबर ने अपने वफादारों के बूते बैरम खान की शक्ति को कमजोर कर दिया .अकबर बैरम खान की स्वामिभक्ति को देखते हुए उससे सख्ती नहीं करना चाहता था इसलिए एक दिन अकबर ने बैरम खां को बुलाकर कहा कि अब वो खुद मुग़ल सल्तनत की बागडोर अपने हाथों में लेना चाहता है इसलिए बेहतर है कि आप मक्का की ओर प्रस्थान करें. अकबर की इस इच्छा को बैरम खां ने अपनी नियति समझा और मक्का की ओर प्रस्थान कर गया .

अकबर को संदेह था कि बैरम खां की सत्ता की भूख इतनी बढ़ चुकी है कि उन्हें मक्का जाना शायद ही रास आये .इसलिए उसने अपने सूबेदार पीरजादा को बैरम खां के पीछे लगा दिया .जब बैरम खां को इसका पता चला तो उसे काफी दुःख पहुंचा और वो मक्का जाने की बजाय पंजाब जा पहुंचा और वहीं से अकबर के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया. अब युद्ध अकबर की मजबूरी बन गई.

बैरम खान ने अपने कुछ सरदारों के साथ शाही सेना का मुकाबला किया लेकिन हार गया .उसे पकड़कर दरबार में पेश किया गया. अकबर ने एक बार फिर उदारता दिखाते हुए बैरम खान को माफ़ कर दिया और मक्का की ओर प्रस्थान करने की इजाजत दे दी .लेकिन रास्ते में ही किसी अफगान ने उसकी ह्त्या कर दी .इस तरह बैरम खान का काँटा हमेशा के लिए अकबर की जिन्दगी से निकल गया.

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