इस राजा की कमजोरी के कारण पेशवाओं ने मराठा साम्राज्य का कर दिया खात्मा

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छत्रपति शाहूजी महाराज के आख़िरी दिन सुखमय नहीं रहे .शाहूजी का कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्हें अपने उत्तराधिकारी की च्निता सताती रहती थी. शाहूजी ने ताराबाई को मुक्त कर दिया था जिसके बाद वो एक बार फिर से सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए तत्पर हो उठी .दरबारियों की सलाह थी कि कोल्हापुर के शम्भाजी को वारिस बनाया जाए लेकिन शाहूजी इसके लिए तैयार नहीं थे .ताराबाई ने एक बच्चा पेश किया जिसे अपने पुत्र का पुत्र बताते हुए शाहूजी से प्रार्थना की कि इसे ही गोद लेकर राम राजा के नाम से अपना वारिस घोषित कर दें. 

25 दिसंबर 1749 को शाहूजी की मृत्यु हो गई जिसके बाद ताराबाई ने  राम राजा को गद्दी पर बैठा कर सारे शासन सूत्र अपने हाथों में ले लिया. ताराबाई राम राजा को अपने कठिन नियंत्रण में रखती थी और हमेशा इस कोशिश में जुटी रहती थी कि उसका पेशवाओं से कोई ताल्लुक ना रहे. राम राजा जल्द ही इस नियंत्रण से उब गया और उसने ताराबाई का विरोध करना शुरू कर दिया. पेशवा ने बीच बचाव के लिए दोनों को पुणे बुलवाया .पेशवा ने राम राजा से एक समझौते पर जबरन हस्ताक्षर करवा लिए जिसके मुताबिक़ मराठा साम्राज्य का सारा काम-काज पेशवा ही देखेंगे  .अब राम राजा नाममात्र के राजा रह गए और पेशवा ही प्रमुख हो गए. \

पेशवा के इस समझौते का ताराबाई ने विरोध किया और कई मराठा सरदारों के साथ मिलकर पेशवा को चुनौती दी. उन्होंने रामराजा को कैद में डाल दिया .ताराबाई और पेशवा के बीच कई युद्ध हुए जिसमें हर बार ताराबाई की पराजय हुई .अंत में एक संधि के तहत पेशवा ने ताराबाई को कुछ अधिकार दे दिया. ताराबाई ने रामराजा के पुत्र छोटे शाहू को गद्दी पर बैठा दिया .लेकिन शासन के सारे सूत्र पेशवाओं  के हाथों में ही रहे. 1770 में राम राजा की मौत हो गई .इसके साथ ही मराठा साम्राज्य में पेशवाओं का वर्चस्व हो गया. 

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