जब कृष्णदेव राय अपने सबसे बड़े दुश्मन को कैद आजाद कर सुल्तान बना दिया

कृष्णदेव राय ना केवल एक योद्धा था बल्कि एक मंझा हुआ कूटनीतिज्ञ भी था . .कृष्णदेव राय की राजनीतिक दूरदर्शिता का पता इससे ही चलता है कि उसने महमूदशाह को कैद से आजाद कर उसे फिर से बहमनी का सुलतान बना दिया ताकि मुसलामानों में फूट डालकर उन्हें एक साथ होने से रोका जा सके

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15वीं सदी में दक्षिण भारत में बहमनी और विजयनगर दो ऐसे साम्राज्य थे जिनका अस्तित्व ही हिन्दू और मुस्लमान धर्म पर टिका हुआ था .एक-दूसरे को जीतने की निरंतर कोशिशें चलती रहती थी और अक्सर लड़ाइयों होती रहती थी .1509 में बहमनी सुल्तान महमूद शाह ने विजयनगर पर आक्रमण कर उसके शासक वीर नरसिंह तुलुव को मार डाला .इससे पहले की महमूद इस राज्य पर कब्जा कर पाता, नरसिंह के छोटे भाई कृष्णदेव राय ने मोर्चा संभाल लिया .कृष्णदेव राय ने ना केवल महमूद को राज्य से बाहर खदेड़ा बल्कि बहमनी में घुस कर उसपर अधिकार कर महमूद को बंदी बना भी बना लिया.

कृष्णदेव राय ना केवल एक योद्धा था बल्कि एक मंझा हुआ कूटनीतिज्ञ भी था . .कृष्णदेव राय की राजनीतिक दूरदर्शिता का पता इससे ही चलता है कि उसने महमूदशाह को कैद से आजाद कर उसे फिर से बहमनी का सुलतान बना दिया ताकि मुसलामानों में फूट डालकर उन्हें एक साथ होने से रोका जा सके .इतना ही नहीं कृष्णदेव राय ने बीजापुर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया और मह्मूद्शाह के बेटे को उसका शासक बना दिया .इस तरह उसने महमूद शाह को अपना गुलाम बनाकर मुस्लिम राज्यों की शक्ति को काफी कमजोर कर दिया .उसने समस्त दक्षिण भारत के राजाओं को हराया .वो युद्ध में कभी पराजित नहीं हुआ और इस तरह उसने दक्षिण भारत में एक विशाल हिन्दू राज्य की स्थापना कर डाली .1530 में उसकी अचानक मौत हो गई .बाबर ने अपनी आत्मकथा में कृष्णदेव राय को भारत का सबसे शक्तिशाली शासक स्वीकार किया है

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