जत्थेदार जस्सा सिंह आहलुवालिया को भाई बना कर बेगम ने बचा ली मुग़ल सल्तनत

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इतिहास इस बात की तस्दीक करता है कि दिल्ली के लाल किले पर हमेशा से ही मुस्लिम शासकों का राज रहा है.लेकिन सन 1783 में ऐसा पहली बार हुआ, जब सिख सेना ने बादशाह शाह आलम को घुटनों पर ला दिया और लाल किले पर केसरी निशान साहिब (झंडा) लहराया था.बाबा बघेल सिंह की अगुवाई में जत्थेदार जस्सा सिंह आहलुवालिया और जत्थेदार जस्सा सिंह रामगढ़िया ने मुगलों पर आक्रमण कर दिया.इसमें जत्थेदार जस्सा सिंह आहलुवालिया की बेहद अहम भूमिका रही और उनकी वीरता व बहादुरी को देखते हुए दीवान-ए-आम में उन्हें ‘सुल्तान-उल-कौम’ की उपाधि दी गई.आहलुवालिया को लाल किले में बादशाह के पद पर बैठने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि सिख धर्म में बादशाह का कोई सिद्धांत नहीं है.

सन 1761 में जस्सा सिंह आहलुवालिया के कुशल नेतृत्व में सिखों ने पानीपत की लड़ाई से लौट रहे अहमद शाह अब्दाली पर हमला किया और 2200 हिंदू महिलाओं को उसके चंगुल से रिहा कराकर सकुशल उनके घर पहुंचाया. 8 अप्रैल 1783 को बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह आहलुवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया की अगुवाई में 40 हजार सैनिक बुराड़ी घाट पार कर दिल्ली में दाखिल हुए.सिख सेना की दिल्ली में होने की खबर सुनकर बादशाह शाह आलम घबरा गया और उसने मिर्जा शिकोह के नेतृत्व में महताबपुर किले पर सिख सेना को रोकने की कोशिश की. हालांकि वहां पर पराजित होकर वह भाग गया और लाल किले में जाकर छिप गया.

जब शाह आलम ने देखा कि सिखों ने दीवान-ए-आम पर कब्जा कर लिया है तो वह अपने वकील रामदयाल और बेगम समरू के साथ अपने जीवन की भीख मांगने लगा.बेगम समरू बेहद मंझी हुई राजनीतिज्ञ थी, इसलिए उसने तुरंत ही तीनों जरनैलों को अपना भाई बना लिया और दो मांगें उनके सामने रख दीं.पहली शाह आलम का जीवन बख्श दिया जाए और दूसरा लाल किला उसके कब्जे में रहने दिया जाए.

इन मांगों के बदले में तीनों जरनैलों ने चार शर्तें रखीं जो शाह आलम ने मान ली. जस्सा सिंह आहलुवालिया व जस्सा सिंह रामगढ़िया दीवान-ए-आम का 6 फुट लंबा, 4 फुट चौड़ा और 9 इंच मोटा पत्थर का तख्त उखाड़कर घोड़े के पीछे बांधकर अपने साथ अमृतसर ले गए.यह तख्त आज भी दरबार सिंह, अमृतसर के नजदीक बने रामगढ़िया बुर्ज में रखा हुआ है.

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