जब ईरान के शाह ने हुमायूं को जबरन सुन्नी से शिया मुसलमान बनाया

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चौसा की लड़ाई में शेरशाह के हाथों बुरी तरह पराजित हुमायूं अपनी सेना की छोटी से टुकड़ी के साथ अफगानिस्तान की तरफ भाग निकला। उसका इरादा काबुल पहुँच कर अपने भाई कामरान और अस्करी से मदद मांग वापस भारत पर कब्जा जमाने का था लेकिन जब कामरान को इसकी भनक लगी तो उसने हुमायूं को घेर कर मारने की योजना बनाई। हुमायूं को इसके बारे में पता चला गया और कामरान के पहुँचने से पहले ही वहां से भाग निकला। दर-दर भटकता हुमायूं पर्शिया की सीमा तक पहुंचा. हुमायूं ईरान के शाह से मिलकर उसकी मदद हासिल करना चाहता था. लेकिन खुद उसे इस बारे में भरोसा नहीं था। फिर भी उसने जोखिम उठाने का निश्चय किया। शाह को जब इस बारे में पता चला तो उसने  हुमायूं की उम्मीद के विपरीत उसकी खूब खातिरदारी की। उसने अपने बेटे को हुमायूं की अगवानी के लिए भेजा और उसे आज्ञा दी की वो हिन्दुस्तान के अभागे और भगोड़े बादशाह को पूरे सम्मान के साथ दरबार में लेकर आये। 

पर्शिया के शाह की इस ख़ातिरदारी से हुमायूं अवाक था। ये साफ़ था इसके पीछे शाह का कोई ना कोई स्वार्थ जरूर था। मुलाक़ात के दिन जब शाह हुमायु से मिलने आया तो हुमायूं ने सुन्नी पगड़ी पहन रखी थी। शाह ने हुमायूं से पगड़ी उतारने को कहा। ये सरासर बेइज्जती थी लेकिन हुमायूं के सामने चारा ही क्या था. उसे पगड़ी उतारनी पडी। इसके बाद शाह ने अपनी पगड़ी उतार कर हुमायूं के सामने रख दी और अपने सैनिकों से हुमायूं की घेराबंदी करने को कहा. हुमायूं घबरा कर शाह की तरफ देखने लगा। तब शाह ने धमकी भरे अंदाज़ में हुमायूं से कहा -एक तरफ तुम्हारी ज़िंदगी और हिन्दुस्तान का ताज है और दूसरी तरफ सुन्नी से शिया बनने का विकल्प। वो जिसे चाहे चुन सकता है. हुमायूं के लिए करो या मारो जैसे हालात थे उसने शाह की बात मानते हुए शिया पगड़ी अपने सर पर रख ली। इस मौके पर तीन दिन तक पूरे पर्शिया में जश्न मनाया गया और हुमायूं का  राजकीय अतिथि की तरह सम्मान-सत्कार किया गया। 

शाह ने हुमायूं को सैनिक और आर्थिक मदद की घोषणा से पहले शर्त रखी की उसे कंधार जीत कर शाह के हवाले करना होगा। कंधार पर उन दिनों हुमायु के भाइयों का शासन था। हुमायूं को ये शर्त माननी पडी। इसके बाद शाह ने हुमायूं को महीने भर की मोहलत देते हुए ढेर सारे सैनिकों के साथ कंधार की और रवाना कर दिया। 

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